ऐसा लग रहा था कि हम वोटों के सूखे वाले क्षेत्र से मतदान की बारिश वाले इलाके में पहुंच गए। एक तरफ बूथ वोटरों के लिए तरस रहे थे तो दसूरी तरफ बूथों पर मतदाताओं की लंबी लाइन। शहर के कुछ बूथों का दौरा करने के बाद हम मिनी बाईपास होते हुए सीबीगंज, मथुरापुर और परसाखेड़ा की तरफ बढ़ रहे थे। रास्ते का एक-एक बूथ हमें शहर और देहात का अंतर समझा रहा था।
मौसम भी मेहरबान था। ऐसा लग रहा था कि गुनगुनी धूप ठंड में दुबके लोगों को बाहर निकलकर वोट डालने के लिए उत्साहित कर रही है। मिनी बाईपास से गुजरते वक्त साफ नजर आ रहा था कि खांटी शहरी लोगों की अपेक्षा देहात के लोग कितने जागरूक होते हैं। इस रोड पर जहां कई किलोमीटर तक सन्नाटा पसरा हुआ था, वहीं जीके मांटेसरी स्कूल पर बने बूथ पर लगी भीड़ का कोलाहल उस सन्नाटे को खत्म कर रहा था। प्रत्याशियों के बस्ते पर जुटी भीड़ वोटर लिस्ट में खुद को तलाश रही थी। आगे हमें आईटीआई के पास बने बूथ के आसपास भी खासी भीड़ दिखी। रास्ते में जो भी बूथ मिले, वहां मतदाताओं की संख्या शहरी मतदाताओं को आईना दिखा रही थी। सीबीगंज, मथुरापुर और परसाखेड़ा होते हुए हम केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार के गांव पहुंचे। गांव में एक ही स्कूल में दो बूथ बने थे।
बूथों के बाहर लोगों की नाराजगी का अहसास कुछ दूर से ही प्रतीत हो रहा था। पास पहुंचते ही लोगों की शिकायत गूंजने लगी। किसी का नाम गलत था तो किसी का कट गया था। मोहम्मद एहसान का नाम बदल गया था। नसीम बानो का तो नाम ही कट गया था। इरफान नाम के युवक का नाम वोटर लिस्ट में हसमंद अंकित था। कैलाश की वल्दियत ही वोटर लिस्ट में बदल दी गई थी। भीड़ और उनकी शिकायतें लोकतंत्र में अटूट श्रद्धा के भाव का अहसास करा रही थीं। दोनों बूथों पर 2785 वोट थे, जिनमें से 800 से अधिक वोट 12 बजे तक डाले जा चुके थे, वो भी तब जब मतदाताओं की शिकायत थी कि पोलिंग अफसर बहुत धीरे-धीरे वोट डलवा रहे हैं। हम लोग वहां से निकल ही रहे थे कि एक ऑटो बूथ की तरफ बढ़ता दिखा। हम भी पीछे भागे। ऑटो में पेट की गंभीर बीमारी से जूझ रहे महेंद्र पाल वोट देने आए थे। उनका हाल में ही ऑपरेशन हुआ है और वह चलने-फिरने में असमर्थ हैं। मन में आया, क्या नाम दूं इस श्रद्धा को। बूथ पर बगैर किसी औपचारिकता के या लाइन में लगे महेंद्र पाल को वोट डालने दिया गया।
ट्यूलिया से हम बंडिया गए। वहां शांतिपूर्ण तरीके से मतदान चल रहा था। बूथों और उसके बाहर लगी भीड़ इस लोकतांत्रिक पर्व का उत्साह बढ़ा रही थी। पर्दानशीं महिलाओं की संख्या सबसे अधिक थी। कुछ महिलाएं घूंघट की आड़ में इस महापर्व में शरीक हो रही थीं। समय बीतने के साथ बढ़ती भीड़ लोकतंत्र के शान में कसीदे गढ़ रही थी। वापस हम शहर की ओर आए, लेकिन बूथ वोटरों के लिए अब भी तरस रहे थे। जहां जागरूकता अभियान चलाया गया, वहां मतदान का सूखा और जहां कोई अभियान नहीं चला वहां वोटों की बारिश। आखिर क्या कहें इस उदासीनता को।



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