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मोनिका का दर्द और मेरा पत्रकारीय संतोष



मानसून की पहली बारिश में तन-मन से तर-बतर होकर ऑफिस पहुंचा ही था। रोज की तरह कम्प्यूटर ऑन किया। ब्राउजर पर जाकर एक के बाद एक पहले मेल आईडी, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर लॉगइन किया। फेसबुक ओपन करते ही सामने जो तस्वीर थी, वो अधूरी होने के बाद भी जानी-पहचानी सी लगी। पोस्ट जागरण इंस्टीट्यूट में मेरी जूनियर रही मोनिका शेखर का था। चेहरे पर नाखुन के निशान काफी कुछ बयां कर रहे थे। उस पर ट्रेन में सीट के विवाद में उस समय हमला हुआ था, जब वह सीवान से नई दिल्ली के सफर पर थी। गोरखपुर और गोंडा के बीच हुए हमले के बाद भी ट्रेन की स्क्वायड से लेकर लखनऊ, बरेली, मुरादाबाद और यहां तक कि नई दिल्ली की रेल पुलिस पंगु बनी रही और एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करती रही। यह हाल तब था, जब कहीं से कोई राहत न मिलने पर मोनिका ने रेल मंत्री को ट्वीट किया था।

मोनिका के पोस्ट को देखने के बाद मुझे लगा कि उसके लिए कुछ करना चाहिए। तब तक मैं मुत्तमईन नहीं था कि वह ट्रेन मेरे कार्यक्षेत्र बरेली से होकर गुजरी होगी। उधेड़बुन के बीच मैं अपना काम करता रहा पर ध्यान खामख्वाह उस पोस्ट पर चला ही जा रहा था। मैं बार-बार उसे पोस्ट को देख रहा था और रेलवे पुलिस की व्यवस्था को कोस रहा था। मैं यह भी तय नहीं कर पा रहा था कि मोनिका के पोस्ट पर क्या रिएक्शन दूं। तमाम रिएक्शन के बीच मेरे गुरुजी माननीय डा. सीपी सिंह का भी आक्रोश दिखा। उन्होंने मोनिका का ढांढस बंधाते हुए एफआईआर दर्ज कराने की सलाह दी थी। मुझे भी लगा कि एफआईआर तो होना ही चाहिए। तब तक दो ढाई घंटे निकल गए थे। एक बार फिर मैं मोनिका के पोस्ट पर गया और इस बार मैं फोटो को न देखकर टेक्स्ट पढ़ने लगा। टेक्स्ट में लखनऊ और मुरादाबाद स्टेशनों का जिक्र था। फिर मुझे लगा कि मैंने कुछ हासिल कर लिया है। टेक्स्ट से मैंने मोनिका का फोन नंबर नोट किया और फिर सीधे डायल कर दिया। फोन पर दूसरी तरफ मोनिका थी।

अभी तक वो मुझे पहचान नहीं रही थी। चूंकि हमारी एक-दो बार की ही मुलाकात हुई थी वो भी वर्षों पहले। मैं दैनिक जागरण, लुधियाना छोड़ रहा था तो उसने ज्वाइन किया था। मुश्किल से दो-तीन दिन ही हम साथ काम कर पाए थे। हां, नाम से मैं वाकिफ था। मोनिका की नजर में मेरा यही परिचय था कि उसके ज्वाइन करते ही मैंने संस्थान को बाय-बाय बोल दिया था। फोन पर मैंने सीधे उसके पोस्ट का जिक्र करते हुए बात शुरू की। फिर मैंने बताया कि मैं आपको पहचानता हूं और आपके ज्वाइन करते ही मैंने संस्थान को नमस्ते बोल दिया था। तब वह मुझे पहचान गई। साथ ही उसकी आवाज में एक खनक महसूस हुई। शायद उसे लगा कि मेरी बात कोई सुनने वाला है, क्योंकि रेलवे तंत्र से इस मामले में वह धोखा खा चुकी थी। फिर उसने इत्मीनान से पूरी बात बतानी शुरू की। मैं भी उसकी बातों को नोट करता चला गया। मोनिका ने अपने पति धीरज से भी बात कराई। धीरज ने अपील करती आवाज में कहा, आपलोग मीडिया में हैं, कुछ सपोर्ट मिल जाए तो हमारी सुन ली जाएगी। मैंने अपनी तरफ से कुछ करने का भरोसा दिलाया।

फोन रखते ही मैं संपादक जी श्री मनीष मिश्रा सर के पास गया और पूरी कहानी बयां की। संपादक जी ने ओके कर दिया और कहा कि खबर बनवाओ। अब मेरी उधेड़बुन खत्म हो रही थी। मोनिका की जाने कितनों ने मदद की होगी। मैं भी अब उनमें खुद को एक मानने लगा था। खबर अच्छी तरह छप गई। रात को जब मैंने ऑफिस छोड़ा तो मुझे लगा कि पत्रकारिता के प्रोफेशन में होने के बाद भी वर्षों बाद मैंने पहली बार इस तरह नि:संकोच होकर किसी की मदद की। मन में संतोष था, शायद इसलिए नींद अच्छी आई। सुबह एक फोन कॉल से मेरी नींद खुली। हल्की बारिश हो रही थी। दूसरी ओर से आवाज आई....थैंक्स सुनील जी। खबर बेहतर डिस्प्ले में लगी। ई-पेपर में देखा। एक बार फिर थैंक्स। मैंने खुद को भी मन ही मन थैंक्स बोला और एक बार फिर नींद की आगोश में चला गया। आज की नींद कुछ खास थी, कुछ स्पेशल...।

टिप्पणियाँ

  1. सुनील जी वाकई यहीं पत्रकारिता का वसूल भी है कि हम अामजन की अावाज बनें किसी पार्टी अाैर दायरे में सीमित नहीं रहें। काबिले गाैर है अापका यह प्रयास। अाशा है भविष्य में भी अाप अपने पाठकाें अाैर जनता की अावाज को धार देते रहेंगे अाैर सजग पत्रकारिता जारी रखेंगे। फिर एक बार साधुवाद।

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  2. बहुत ही सुकून मिलता है, जब कुछ अच्छा करने की चाहत हो और ओ पूरा हो जाए।
    बहुत शानदार लेख है,
    सुबह बारिश के समय में एक फोन की घंटी से टूटी नींद और फिर सो जाना ही आपके सुकून को बताती है कि आप क्या महसूस कर रहे थे।

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