आमूलचूल बदलाव के मौसम वसंत ऋतु उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में एक और बदलाव की गवाह बन सकती है। वसंत के साथ-साथ यह चुनावी मौसम भी है। इस समय नेता जनता के दर पर हैं। रैलियां चरम पर हैं। हेलीकॉप्टर धूल का गुबार उड़ाते उतर रहे हैं और कुछ ही मिनटों में नेताओं की बकैती के बाद फिर आसमानी सैर पर निकल पड़ते हैं। जिन नेताओं को आम दिनों में जिला मुख्यालयों या शहरों में आने की फुरसत नहीं मिलती, वे इस समय गांवों तक की खाक छान रहे हैं। कई ऐसे तहसील और कस्बे होंगे, जहां मुख्यमंत्री तो छोडि़ए मंत्री तक ना गए होंगे, वहां इस समय एक उड़नखटोला उड़ रहा है तो दूसरा उतर रहा है।
जनता इस समय जनार्दन है और नेतारूपी भक्त मन में एवमस्तु का वरदान पाने की लालसा में खाक छान रहे हैं। तरह-तरह के जुमले वादे का रूप लेकर सामने आ रहे हैं। पांच साला इस जलसे में उलट बयार सदा से बहती चली आ रही है। एक से एक वीआईपी गाड़ियां गांवों का रुख कर रही हैं। कम-अधिक विकास के छोटे-बड़े दावों को छोड़ दें तो मतदाताओं को प्रमोशन सिर्फ इस रूप में हुआ कि वे बैलेट पेपर पर ठप्पा लगाने के बदले ईवीएम पर बटन दबाने लगे। इसके अलावा एक और उपलब्धि रही कि अब उनके सामने नो च्वाइस यानी नोट का बटन भी दबाने का मौका हाथ आ गया है। बाकी सड़क, बिजली, पानी, आवास जैसे आधारभूत जरूरतें कल भी मुद्दा थीं और अब भी बरकरार हैं। हमेशा की तरह नेता जनता को बरगला रहे हैं कि सही प्रत्याशी का चुनाव करें। अब सवाल उठता है कि सही कौन है? किसके माथे पर सही का लेवल लगा हुआ है? एक बार चुन लिया तो फिर पांच साल का संताप। सही हो या गलत। बीच का कोई रास्ता नहीं है। लोकतंत्र के सुनहरे इतिहास के बाद भी हम अब भी इस तरह का कोई मैकेनिज्म नहीं बना पाए हैं कि चुनाव गलत हो गया तो उसे सुधारा जा सके। जनता को मौके एक बार हैं और नेताओं को गलती करने के लिए पांच साल। गब्बर अभी होता तो बोलता, कितनी नाइंसाफी है रे कालिया।
बसंत पंचमी से पहले शुरू हुआ चुनावी शोर उस समय खत्म होगा, जब हम फगुआ गा रहे होंगे और होली के रंग में सराबोर होंगे। तब किसी के रंग में भंग पड़ेगा तो कोई होली को दोगुने, तिगुने या जितने गुने कह लीजिए, उतने उत्साह से गुलाल उड़ाएगा। तब नवसंवत्सर शुरू होने का भी समय होगा। देखना यह है कि नवसंवत्सर किसके लिए नया सवेरा लेकर आता है। जो जीतेगा, उसके लिए नया सवेरा। जो हारेगा, वो कुछ दिनों की सुस्ती के बाद अपने धंधे-पानी में लग जाएगा पर जनता के लिए सब दिन एक समान। जनता तो रेडियो, टीवी, वेबसाइटों से चुनाव परिणाम जानकर खुश या दुखी होती रहेगी। चुनाव परिणाम आने के साथ ही जनता के लिए पांच साला संताप रिचार्ज हो जाएगा और उसकी वैलिडिटी अगले चुनाव तक होगी।
नई सरकार आएगी तो अपने हिसाब से या तो लोहिया, अंबेडकर, कांशीराम, दीनदयाल आदि महामानुषों के नाम पर अलंकृत योजनाओं की शुरुआत होगी। इन योजनाओं के बिना पर अगला आम चुनाव आ जाएगा। इन योजनाओं के बूते नेता लोग फिर जनता जनार्दन के सामने वोट रूपी भीख मांगने जाएगी। जनता को बरगलाया जाएगा, बहलाया जाएगा, फुसलाया जाएगा, भरमाया जाएगा, बेवकूफ बनाया जाएगा। आम चुनाव में बढ़त या झटका लगने पर योजनाओं की फिर से समीक्षा होगी। फिर किसी महामानुष के नाम पर और अधिक लोकलुभावन योजनाएं सामने आएंगी। काम कम और प्रचार अधिक होगा। बीच-बीच में पंचायत और निकाय चुनाव में भी जनता को जनार्दन बनाने का ढोंग होता रहेगा। फिर अगला विधानसभा चुनाव आ जाएगा। फिर वहीं प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इस बीच में एक पीढ़ी खत्म हो जाएगी। नई पीढ़ी नया वोटर बनकर सामने होगी। उन्हें बरगलाना आसान होगा। अखबार, टीवी और वेबसाइट्स कहते रहेंगे कि वोटर होशियार हो चुका है और नेताओं के झांसे में नहीं आएगा पर हकीकत यह है कि झांसे में नहीं आएगा तो जाएगा कहां। नोटा अब भी बेहतर विकल्प नहीं बन पाया है और शायद ही कभी बन पाए।
लोकतंत्र की यह सनातन प्रक्रिया है और इसमें बहुत आमूलचूल बदलाव की उम्मीद बेमानी है। यह कोई बसंत ऋतु नहीं है कि पूरी आबोहवा बदल देगा। यह तो पीपीटी की स्लाइड की तरह है। लोकतंत्र का स्लाइड शो जारी रहेगा। पात्र बदलते रहेंगे पर कंटेंट में कोई छेड़छाड़ नहीं हो पाएगा।
जनता इस समय जनार्दन है और नेतारूपी भक्त मन में एवमस्तु का वरदान पाने की लालसा में खाक छान रहे हैं। तरह-तरह के जुमले वादे का रूप लेकर सामने आ रहे हैं। पांच साला इस जलसे में उलट बयार सदा से बहती चली आ रही है। एक से एक वीआईपी गाड़ियां गांवों का रुख कर रही हैं। कम-अधिक विकास के छोटे-बड़े दावों को छोड़ दें तो मतदाताओं को प्रमोशन सिर्फ इस रूप में हुआ कि वे बैलेट पेपर पर ठप्पा लगाने के बदले ईवीएम पर बटन दबाने लगे। इसके अलावा एक और उपलब्धि रही कि अब उनके सामने नो च्वाइस यानी नोट का बटन भी दबाने का मौका हाथ आ गया है। बाकी सड़क, बिजली, पानी, आवास जैसे आधारभूत जरूरतें कल भी मुद्दा थीं और अब भी बरकरार हैं। हमेशा की तरह नेता जनता को बरगला रहे हैं कि सही प्रत्याशी का चुनाव करें। अब सवाल उठता है कि सही कौन है? किसके माथे पर सही का लेवल लगा हुआ है? एक बार चुन लिया तो फिर पांच साल का संताप। सही हो या गलत। बीच का कोई रास्ता नहीं है। लोकतंत्र के सुनहरे इतिहास के बाद भी हम अब भी इस तरह का कोई मैकेनिज्म नहीं बना पाए हैं कि चुनाव गलत हो गया तो उसे सुधारा जा सके। जनता को मौके एक बार हैं और नेताओं को गलती करने के लिए पांच साल। गब्बर अभी होता तो बोलता, कितनी नाइंसाफी है रे कालिया।
बसंत पंचमी से पहले शुरू हुआ चुनावी शोर उस समय खत्म होगा, जब हम फगुआ गा रहे होंगे और होली के रंग में सराबोर होंगे। तब किसी के रंग में भंग पड़ेगा तो कोई होली को दोगुने, तिगुने या जितने गुने कह लीजिए, उतने उत्साह से गुलाल उड़ाएगा। तब नवसंवत्सर शुरू होने का भी समय होगा। देखना यह है कि नवसंवत्सर किसके लिए नया सवेरा लेकर आता है। जो जीतेगा, उसके लिए नया सवेरा। जो हारेगा, वो कुछ दिनों की सुस्ती के बाद अपने धंधे-पानी में लग जाएगा पर जनता के लिए सब दिन एक समान। जनता तो रेडियो, टीवी, वेबसाइटों से चुनाव परिणाम जानकर खुश या दुखी होती रहेगी। चुनाव परिणाम आने के साथ ही जनता के लिए पांच साला संताप रिचार्ज हो जाएगा और उसकी वैलिडिटी अगले चुनाव तक होगी।
नई सरकार आएगी तो अपने हिसाब से या तो लोहिया, अंबेडकर, कांशीराम, दीनदयाल आदि महामानुषों के नाम पर अलंकृत योजनाओं की शुरुआत होगी। इन योजनाओं के बिना पर अगला आम चुनाव आ जाएगा। इन योजनाओं के बूते नेता लोग फिर जनता जनार्दन के सामने वोट रूपी भीख मांगने जाएगी। जनता को बरगलाया जाएगा, बहलाया जाएगा, फुसलाया जाएगा, भरमाया जाएगा, बेवकूफ बनाया जाएगा। आम चुनाव में बढ़त या झटका लगने पर योजनाओं की फिर से समीक्षा होगी। फिर किसी महामानुष के नाम पर और अधिक लोकलुभावन योजनाएं सामने आएंगी। काम कम और प्रचार अधिक होगा। बीच-बीच में पंचायत और निकाय चुनाव में भी जनता को जनार्दन बनाने का ढोंग होता रहेगा। फिर अगला विधानसभा चुनाव आ जाएगा। फिर वहीं प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इस बीच में एक पीढ़ी खत्म हो जाएगी। नई पीढ़ी नया वोटर बनकर सामने होगी। उन्हें बरगलाना आसान होगा। अखबार, टीवी और वेबसाइट्स कहते रहेंगे कि वोटर होशियार हो चुका है और नेताओं के झांसे में नहीं आएगा पर हकीकत यह है कि झांसे में नहीं आएगा तो जाएगा कहां। नोटा अब भी बेहतर विकल्प नहीं बन पाया है और शायद ही कभी बन पाए।
लोकतंत्र की यह सनातन प्रक्रिया है और इसमें बहुत आमूलचूल बदलाव की उम्मीद बेमानी है। यह कोई बसंत ऋतु नहीं है कि पूरी आबोहवा बदल देगा। यह तो पीपीटी की स्लाइड की तरह है। लोकतंत्र का स्लाइड शो जारी रहेगा। पात्र बदलते रहेंगे पर कंटेंट में कोई छेड़छाड़ नहीं हो पाएगा।

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