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दक्षिण और हम



कितना अंतर है, तमिलनाडु में अम्‍मा की हालत बिगड़ने मात्र की सूचना से वहां मातम पसर गया है। लोग छाती पीट रहे हैं, भगवान से गुहार लगा रहे हैं, जो हो सकता है वो कर रहे हैं इसलिए कि अम्‍मा बच जाएं। वो सही सलामत अपोलो से बाहर निकलें और सीएम आवास में पूर्व की तरह विराजमान हों। दूसरी तरफ देश में ही तमिलनाडु से इतर एक दुनिया है, जो स्‍मार्टफोन और कंप्‍यूटरों के स्‍क्रीन पर अम्‍मा के निधन की सूचना टाइप कर चुका है और इंतजार कर रहा है कि वो मरें और हम पूरी दुनिया को सबसे पहले यह खबर बताएं। हममें से कई तो ऐसे हैं, जिन्‍होंने अम्‍मा के मरने का भी इंतजार नहीं किया और सोशल मीडिया पर अम्‍मा की स्‍मृति शेष की याद दिला दी। कइयों ने लिखा - अनंत सफर पर निकलीं अम्‍मा। कुछ ने पुरानी फोटो के साथ कुछ ऐसा लिखा कि लगा कि सचमुच अम्‍मा हमें छोड़कर चली गईं। सोमवार को दिन चढ़ने के साथ सोशल मीडिया पर स्थिति स्‍पष्‍ट होती गई लेकिन शाम को फिर वहीं कौतूहल, आतुरता और एक न दिखने वाली लाइन से आगे जाने की सोच, जिस पर अफसोस के अलावा कुछ किया ही नहीं जा सकता।

जरा सोचिए, तमिलनाडुु में अम्‍मा की हालत खराब होने मात्र की खबर से सड़कों पर भीड़ जमा हो गई। कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति खराब न हो जाए, इसके लिए सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट कर दिया गया। अपोलो अस्‍पताल  के बाहर बैरिकेडिंग कर दी गई और भारी संख्‍या में फोर्स तैनात कर दिया गया, टीवी स्‍क्रीन पर मातम मनाते लोगों के हावभाव हालात बयां करने के लिए काफी हैं। वहां शासन और प्रशासन भी इस बात का अंदाजा लगाने में नाकाम साबित हो रहा है कि अगर वाकई अम्‍मा की मौत हो गई तो कानून व्‍यवस्‍था संभल पाएगा कि नहीं। और यहां हम अम्‍मा की मौत की खबर की बाट जोह रहे हैं... किसलिए? केवल इसलिए न कि आप सबसे पहले वर्चुअल दुनिया में अम्‍मा की मौत की खबर बांट सकें। सबसे पहले फेसबुक स्‍टेटस अपडेट कर सकें और सबसे पहले व्‍हाट़सएप ग्रुप में शेयर कर सकें और टिवटर पर सबसे पहले टवीट कर सकें। यह भूख क्‍यों? बदले में आपको क्‍या मिलेगा?

हमें अफसोस होना चाहिए कि उत्‍तर भारत में नेताओं के प्रति वो अपनत्‍व नहीं है या हम अपने नेताओं के प्रति ऐसा अपनत्‍व नहीं दिखा पाते, जो अभी तमिलनाडुु में दिख रहा है। हो सकता है कि हमारे यहां के नेता ऐसे न हों और अगर होंगे तो हो सकता है कि हम वैसे न हों। अगर अम्‍मा की जगह कोई उत्‍तर भारत का नेता होता और तमिलनाडु की जगह बिहार, उत्‍तर प्रदेश, दिल्‍ली या कोई और राज्‍य होता तो क्‍या हम तब भी ऐसेे ही गैरजिम्‍मेदाराना हरकत करते। एक जीवित मरणासन्‍न राजनीतिक विभूति को मृत घोषित कराने के लिए इतनी जल्‍दबाजी क्‍यों? यह केवल सूचना देने और लेने की भूख है या फिर हमारी क्षीण सोच का नतीजा है, जो हमें लगातार ऐसे कदम उठाने को बाध्‍य कर रहा है। ऐसा कर कहीं हम स्‍मार्ट भांड़़ की श्रेणी में तो नहीं जा रहे हैं। पुराने जमाने में भांड़ भी इतना संवेदनहीन नहीं होते थे कि जिंदा व्‍यक्ति को मृत करार दें। उस समय भी संवेदना का अपना एक स्‍थान होता था।

जयललिता जिस हालात में हैं, वहां से बचकर निकलना नामुमकिन सा है। अच्‍छा होता कि उन्‍हें स्‍वाभाविक मौत मरने दिया जाए। सोशल मीडिया पर वे बार-बार मर रही हैं, हर पोस्‍ट में मर रही हैं, हर व्‍हाट़सएप ग्रुप में मर रही हैं, हर टवीट में उनकी मौत हो रही है। जाहिर है, जयललिता इन सब टुच्‍चैै हरकतों की हकदार नहीं हैं। जिस महिला के पीछे एक पूरा प्रदेश विलाप कर रहा है, मातम मना रहा है, लोग छाती पीट रहे हैं, कानून व्‍यवस्‍था को खतरा हो गया है तो पड़ोसी राज्‍य  (बाकी प्रदेश) के लोगों का भी पड़ोस के नाते कुछ फर्ज तो बनता ही है। क्‍या हम अपने पड़ोसी की मौत की ऐसे ही बाट जोहते हैं। क्‍या हम अपने या पड़ोसियों के यहां मातम को ऐसे ही मनाते हैं, जैसे सोशल मीडिया पर आपकी अंगुलियां नंगा नाच कर रही हैं। आप मत रोइए, आंसू मत बहाइए, छाती मत पीटिए पर अपनी संवेदनशीलता को तो ऐसे न जाया होने दें।

टिप्पणियाँ

  1. उत्तर भारत के लोग लोकतांत्रिक रूप से मजबूत हैं, लोकतंत्र में भक्ति की जगह नहीं होती है। नहीं तो लोकतंत्र और राजतंत्र में अंतर क्या रह जाएगा। मैं तो गर्व से कहता हूं कि उत्तर भारतीय अपने नेता को राजा के बजाय सेवक समझते हैं।

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  2. उत्तर भारत के लोग लोकतांत्रिक रूप से मजबूत हैं, लोकतंत्र में भक्ति की जगह नहीं होती है। नहीं तो लोकतंत्र और राजतंत्र में अंतर क्या रह जाएगा। मैं तो गर्व से कहता हूं कि उत्तर भारतीय अपने नेता को राजा के बजाय सेवक समझते हैं।

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