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तुम मुझे #Vote दो, मैं तुम्‍हें मोबाइल दूंगा

शीर्षक का राग तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दिया था। यहां चुनावी राजनीति के लिहाज से शब्‍दों का हेरफेर किया गया है। शायद नेताजी आज के समय में चुनाव लड़ रहे होते तो उन्‍हें भी इसी तरह का लोकलुभाव नारा देना पड़ता। चलिए नेताजी नहीं हैं लेकिन एक दूसरे नेताजी के सुपुत्र और उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री ने यह नारा देकर युवाओं में खास संदेश देने की कोशिश तो की ही है। चुनावी राजनीति में लेनदेन के वादे का यह खेल कांग्रेस ने शुरू किया था। आजादी के बाद से कांग्रेस उत्‍तरोत्‍तर अपनी सत्‍ता गंवाती रही और एक से  एक लोकलुभावन नारे देती रही लेकिन वादों पर अमल दूसरी पार्टिंयों के भरोसे छोड़ती गईं। इसी कारण नए-नए छोटे-छोटे राजनीतिक समूह उभरे और बाद में मजबूत होते गए। एक तरह से देखा जाए तो कांग्रेस के वादे सैद़धांतिक ही रह गए, जबकि बाद में उभरीं पार्टियां इस मामले में भौतिकवादी साबित हुईं।

70 के दशक से कांग्रेस लगातार अपनी जमीन खोती गई और क्षेत्रीय क्षत्रप उसे हथियाते गए। इस गंवाने और हथियाने के पीछे के कारणों पर प्रकाश डालें तो एक बड़ा कारण वादों का सैद़धांतिक और भौतिक होना भी है। कांग्रेस ने कभी गरीबी हटाओं का नारा दिया, कभी पिछड़ापन खत्‍म करने की बात कही। कभी दलितों के उत्‍थान को मुद़दा बनाया तो कभी किसी और बात को उछाला। जबकि बाद में उभरे क्षेत्रीय दल लगातार तुम मुझे वोट दो, मैं तुुम्‍हें टीवी दूंगा, साड़ी दूंगा/दूंगी, साइकिल दूंगा, मोटरसाइकिल/स्‍कूटी दूंगा, लैपटॉप दूंगा। होते-होते बात अब स्‍मार्टफोन पर आ पहुंची है। आने वाले दिनों में कहीं ऐसा न हो जाए कि प्रत्‍याशी या पार्टियां वोटरों को यह कहकर रिझाएं कि तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्‍हारा मोबाइल रिचार्ज कराता रहूंगा। ऐसा हो तो कोई आश्‍चर्य की बात नहीं होगी। दरअसल यह देन-लेन देश की सामाजिक स्थिति को बयां करता है। हमारा यह मानस बन गया है या पहले से स्‍थापित है कि तुम्‍हें मुझसे कुछ चाहिए तो मुझे कुछ देना होगा जरूर। यही बात कांग्रेस समझ नहीं पाई और सत्‍ता से बाहर होती गई। 2004 में कांग्रेस ने देश के इस मानस को समझा और लोन माफी का मुद़दा जोर शोर से उछाला। नतीजा, ऐसा चुनाव परिणाम आया, जिसका किसी को अंदाजा तक नहीं था। बाद में पार्टी फिर पुराने ढर्रे पर लौट गई और फिर क्‍या हुआ, बताने की जरूरत नहीं।


अपवाद छोड़ दें तो हमारा वोट बिकाऊ रहा है। हमलोग कच्‍ची शराब के बदले भी वोट देते रहे हैं। अब इससे निकृष्‍टतम बात कोई हो ही नहीं सकती। हमारा वोट सौ रुपये में भी बिका है। हमने एक किलो आलू, आधा किलो मीट, आधा किलो मछली, दो दर्जन अंडेे, एक पौव्‍वा दारू, एक गमछा, एक लूंगी, एक बनियान, एक अंडरवियर पर भी वोट को बिकते देखा है। आपने भी बहुत कुछ देखा होगा। इससे भी निचले दर्जे का मोलभाव होते देखा होगा। यह कोई नई बात नहीं है। यह हम सब जानते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में बड़े स्‍तर पर मोलभाव हुआ। लाेगों को लगा कि वाकई एक ऐसा शख्‍स सत्‍ता में आने जा रहा है, जो 15 लाख रुपये कम से कम झोली में डाल जाएगा। हो सकेगा तो इससे भी अधिक रकम हमारी पॉकेट को गर्म करेगी। हालांकि यह पहले भी जुमला था और अब भी जुमला ही है लेकिन हमारी आकांक्षाएं उस 15 लाख रुपयों के लिए कितनी पिपाशु हैंं। चुनावी वादों में गिव एंड टेक की बात करें तो दक्षिण भारत ने उत्‍तर को दिशा दिखाई। पहले चावल, फिर साड़ी, टीवी, टेबल फैन, सीलिंग फैन, स्‍कूटी आदि वहां चुनावी वादों में शामिल होते हैं और बाकायदा पूरे किए जाते हैं। उत्‍तर भारत इस परिपार्टी को देर से समझ पाया। उत्‍तर भारत में समाजवादी पार्टी ऐसी पहले पार्टी है, जिसने लैपटॉप बांटने की घोषणा कर सत्‍ता में वापसी की थी। पार्टी ने इस वायदे को थोड़े ही सालों के लिए ही सही, लेकिन अपना वायदा निभाया। अब पार्टी अगले चुनाव के लिए स्‍मार्टफोन बांटने का लॉलीपॉप लेकर आ रही है।

हालांकि अभी बिहार के चुनावों में गिव एंड टेक का कल्‍चर हावी नहीं हो पाया है। भारतीय जनता पार्टी ने वहां बीते विधानसभा चुनावों में स्‍कूटी देने का वायदा किया था। इसके अलावा कई ढेर सारी लोकलुभावन वादे किए थे पर जाति की हावी राजनीति के चलते यह सब वहां नहीं चल पाया। वहां अभी भौतिकवादी लेनदेन चलन में नहीं आ पाया है। अभी सिद़धांतवादी वादों पर वहां जनता अपना प्रतिनिधि चुन रही है। ऐसा नहीं है कि वहां का चुनाव एकदम पाकसाफ हो रहा है। वहां भी पौव्‍वा पर वोट गिरते हैं। सब्‍जी, भांजी और तरकारी भी वोट लेने का माध्‍यम हैं लेकिन इन सबके बाद भी यह कहा जा रहा है कि शराब बंद कराने के मुद़दे ने नीतीश कुमार को सत्‍ता पटल पर दुबारा वापसी करा दी।

उत्‍तरप्रदेश के आसन्‍न चुनाव के लिए कांग्रेेस ने फिर वहीं लोन माफी का नारा लेकर उतरी है। किसानों के साथ खाट चौौपाल किए जा रहे हैं। अधिक से अधिक सहूलियतें देने की बातें हो रही हैं। अध्‍ययन के लिहाज से देखें तो इस बार उत्‍तर प्रदेश चुनाव के लिए पार्टिंयांं जो घोषणापत्र पेश करने वाली हैं, वह अपने आप में एक कोर्स होगा और उस पर अलग से शोध्‍ा किया जा सकता है।  पार्टियां अब समझ चुकी हैं कि जनता एक हाथ दो और एक हाथ लो के सिद़धांत पर चल रही है तो उन्‍हें भी उसी लाइन पर चलना होगा। अब यह पार्टियों के ऊपर है कि कौन किस तरह क्‍या दे रहा है और किस तरह वोट ले रहा है। अधिक शोध करना हो तो उत्‍तर प्रदेश के चुनाव नजदीक हैं। आइए देखिए, समझिए, बुझिए फिर शोध करते रहिएगा। 

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