गाली, कबाली और मदारी। इत्तेफाक है कि ये तीनों एक साथ दृश्य हो रहे हैं। गाली का तो इतिहास पुराना है पर इस बार की गाली थोड़ी अलग है। गालियां पहले भी दी जाती रही हैं, अफसोस पहले भी जताई जाती रही है और माफी पहले भी मांगी जाती रही है पर इस बार की गाली चुनाव की चौखट पर दी गई है। इसलिए यह खास हो जाती है। यह गाली कुलीन वर्ग से निकलकर दलित वर्ग को निशाना बना गई है। प्रत्युत्तर में दलित वर्ग से निकली गाली कुलीन वर्ग को छलनी कर गई है। प्रख्यात विचारक हीगल ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद़धांत दिया था पर इस बार की गाली द्वंद्वात्मक समाजवाद का संदेश दे गई है। देखना होगा कि दोनों तरफ से निकली गालियां क्या गुल खिलाती हैं। ध्यान रहे, इसे गोली समझने की भूल न करें।
गाली के बीच कबाली आ गई। करोड़ों दर्शक रजनीकांत के इस मूवी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। दर्शकों ने खूब सराहा। फिल्म में मलेशियाई लोकेशन की शूटिंग ने लोगों का मन मोह लिया। इसके अलावा रजनीकांत का स्टाइल दर्शकों को खूब भाया। इस बीच खबर आई कि फिल्म ऑनलाइन लीक हो गई है। इससे निर्माता और निर्देशक को करारा झटका लगा। हालांकि यह दावा किया जा रहा था कि फिल्म की पाइरेसी रोकने के लिए फूलप्रूफ इंतजाम किए गए हैं पर इंतजाम धरे के धरे रह गए और लीक करने वाले सफल हो गए। फिल्म कबाली की कहानी कुछ भी हो पर अगर गाली के संदर्भ में इसे जोड़ा जाए तो सिर्फ और सिर्फ कबीलाई संस्कृति याद आती है। इस मध्ययुगीन संस्कृति में मानव जानवरों जैसा सलूक करता था। अब इस तथाकथित सभ्य समाज में गाली उसी युग की याद दिलाती है, जो हमने किताबों में पढ़ा है। इसलिए गाली और कबाली का आपस में रिश्ता बनता है। कोई 'दया'वश यूं ही गाली नहीं दे सकता है और कोई 'माया'मय होकर इस तरह जवाबी गाली नहीं दे सकता। यह तो सब कबाली का असर है।
अब आते हैं मदारी पर। फिल्म नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे पर केंद्रित है। इसमें मुख्य पात्र मुख्यमंत्री के बेटे को किडनैप कर लेता है। घुमा-फिराकर फिल्म राजनीति को आईना दिखाती है। फिल्म आज के संदर्भ को भी अच्छी तरह परिभाषित करती है। कैसे नेता मदारी की भूमिका में आ गए हैं। राजनीति आजकल मदारी की भूमिका में है। पात्र नेता जमूरे बनकर रह गए हैं। गाली प्रकरण के बाद तो इस पर और बल लग गया है। तुम मुझे गाली दो, मैं भी तुझे गाली दूंगा और बदले में दोनों को वोट मिलेंगे। जिसकी गाली अधिक असरदार, वोट उसे और भी जानदार।
इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारी राजनीति मदारी से और नेता किसी कबीलाई जाहिल से कम नहीं। गाली प्रकरण के बीच ही रिपोर्ट आई कि दिल्ली में कॉल गर्ल रैकेट का खुलासा हुआ और उसमें तमाम बड़े नेताओं के हाथ हैं। यह खबर अभी चर्चा में ही थी कि संसद भवन परिसर में घुसने की वीडियोग्राफी करते सदस्य को लेकर बवाल मच गया। टीवी पर चलता वीडियो किसी मदारी और जमूरे के सीन को याद दिला रहा था। अच्छा है कि नेताओं ने इस विधा को जिंदा किए रखा है वरना यह विधा भी लुप्त होने के कगार पर है। सिर्फ ड्रेस कोड, प्रोफाइल और किरदार बदल गए हैं पर पेशा वहीं पुराना है जो आप और हम गांवाें देखते थे। फर्क आज इतना है कि मदारी और जमूरे को हम सीधा यानी चावल देते थे और अब वोट देते हैं। एक फर्क यह भी है कि मदारी गांव में कभी भी आ जाते थे लेकिन अब के मदारियों का आना जाना पंचवर्षीय योजना में तब्दील होकर रह गया है।
गाली के बीच कबाली आ गई। करोड़ों दर्शक रजनीकांत के इस मूवी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। दर्शकों ने खूब सराहा। फिल्म में मलेशियाई लोकेशन की शूटिंग ने लोगों का मन मोह लिया। इसके अलावा रजनीकांत का स्टाइल दर्शकों को खूब भाया। इस बीच खबर आई कि फिल्म ऑनलाइन लीक हो गई है। इससे निर्माता और निर्देशक को करारा झटका लगा। हालांकि यह दावा किया जा रहा था कि फिल्म की पाइरेसी रोकने के लिए फूलप्रूफ इंतजाम किए गए हैं पर इंतजाम धरे के धरे रह गए और लीक करने वाले सफल हो गए। फिल्म कबाली की कहानी कुछ भी हो पर अगर गाली के संदर्भ में इसे जोड़ा जाए तो सिर्फ और सिर्फ कबीलाई संस्कृति याद आती है। इस मध्ययुगीन संस्कृति में मानव जानवरों जैसा सलूक करता था। अब इस तथाकथित सभ्य समाज में गाली उसी युग की याद दिलाती है, जो हमने किताबों में पढ़ा है। इसलिए गाली और कबाली का आपस में रिश्ता बनता है। कोई 'दया'वश यूं ही गाली नहीं दे सकता है और कोई 'माया'मय होकर इस तरह जवाबी गाली नहीं दे सकता। यह तो सब कबाली का असर है।
अब आते हैं मदारी पर। फिल्म नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे पर केंद्रित है। इसमें मुख्य पात्र मुख्यमंत्री के बेटे को किडनैप कर लेता है। घुमा-फिराकर फिल्म राजनीति को आईना दिखाती है। फिल्म आज के संदर्भ को भी अच्छी तरह परिभाषित करती है। कैसे नेता मदारी की भूमिका में आ गए हैं। राजनीति आजकल मदारी की भूमिका में है। पात्र नेता जमूरे बनकर रह गए हैं। गाली प्रकरण के बाद तो इस पर और बल लग गया है। तुम मुझे गाली दो, मैं भी तुझे गाली दूंगा और बदले में दोनों को वोट मिलेंगे। जिसकी गाली अधिक असरदार, वोट उसे और भी जानदार।
इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारी राजनीति मदारी से और नेता किसी कबीलाई जाहिल से कम नहीं। गाली प्रकरण के बीच ही रिपोर्ट आई कि दिल्ली में कॉल गर्ल रैकेट का खुलासा हुआ और उसमें तमाम बड़े नेताओं के हाथ हैं। यह खबर अभी चर्चा में ही थी कि संसद भवन परिसर में घुसने की वीडियोग्राफी करते सदस्य को लेकर बवाल मच गया। टीवी पर चलता वीडियो किसी मदारी और जमूरे के सीन को याद दिला रहा था। अच्छा है कि नेताओं ने इस विधा को जिंदा किए रखा है वरना यह विधा भी लुप्त होने के कगार पर है। सिर्फ ड्रेस कोड, प्रोफाइल और किरदार बदल गए हैं पर पेशा वहीं पुराना है जो आप और हम गांवाें देखते थे। फर्क आज इतना है कि मदारी और जमूरे को हम सीधा यानी चावल देते थे और अब वोट देते हैं। एक फर्क यह भी है कि मदारी गांव में कभी भी आ जाते थे लेकिन अब के मदारियों का आना जाना पंचवर्षीय योजना में तब्दील होकर रह गया है।


मौका था और दस्तूर भी। गालियां अब सबको हैं मंजूर।भी। आखिर चुनाव की चौखट जो है। बेहतरीन।
जवाब देंहटाएंमौका था और दस्तूर भी। गालियां अब सबको हैं मंजूर।भी। आखिर चुनाव की चौखट जो है। बेहतरीन।
जवाब देंहटाएंशानदार
जवाब देंहटाएंShandar
जवाब देंहटाएंबहुत ही बढ़िया लेख है,
जवाब देंहटाएंएक गाली की कीमत तुम क्या जानों दया बाबू, हज़ार रैलीयों का काम कर जातीं हैं।
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