कन्हैया छिछोर है, बदतमीज है, आवारा है लेकिन कुछ लोग मजबूर हैं कन्हैया की तारीफ करने के लिए। क्या करें बेचारे, सामने कोई बड़ा चेहरा ही नहीं है। नीतीश कुमार जीत जाते हैं तो उनमें अपना चेहरा देखने की कोशिश, ममता जीत जाएंगी तो उनमें एक चेहरा ढूंढने की कोशिश, केजरीवाल एक चलता-फिरता चेहरा हैं ही, रोहित वेमुला भी चेहरा हो जाते हैं। कन्हैया और उमर खालिद भी एक विकल्प हैं या फिर विकल्पहीनता के मारे हुए लोगों का चेहरा हैं। दूसरी ओर, स्वमेव राहुल गांधी पापड़ की तरह सतह पर हैं ही, जिनके इर्द गिर्द हमेशा बरी थोपने की कोशिश की जाती है। जब जो लोग सफल हो जाते हैं, वे राहुल गांधी और बाकियों को वैसे ही कोसते रहते हैं, जैसे अरविंद केजरीवाल। जो लोग सफल नहीं हो पाते, वे राहुल गांधी में ही अपना चेहरा ढूंढते रहते हैं।
विकल्पहीनता के मारे लोगों को क्या कहें, जिस आवारा कन्हैया को पेशाब करने का सऊर नहीं है उसे राष्टृीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में खड़ा करने की कोशिश करते हैं। दिल्ली विवि की एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने खुलासा किया है कि जेएनयू कैंपस में कन्हैया बेतरतीब तरीके से पेशाब कर रहा था। जब उसे टोका गया तो वह यह कहकर बदतमीजी पर उतर आया कि वह कैंपस में कहीं भी कुछ भी कर सकता है। विवि प्रशासन ने उसके कैरियर को ध्यान में रखते हुए केवल 3000 रुपये जुर्माना लगाकर छोड़ दिया था। अब वहीं कन्हैया महिला अधिकारों की बात करता है और सरेआम कहता है कि कश्मीर में भारतीय सेना महिलाओं के साथ बलात्कार करती है। अब कन्हैया का सिर फोड़ें या फिर उसके समर्थकों का। जिस दिन वह जेल से निकला, एक अंधभक्त बड़े पत्रकार ने कहा- नरेंद्र मोदी को एक ही कला आती है भाषण देने की और उसमें भी कन्हैया ने उन्हें मात दे दी। किसपे हसूं- कन्हैया पर या उस बुदि़ध विलासी पत्रकार पर। ऐसे लोगों ने अपनी बुदि़ध की सुपारी दे रखी है। उस गंजे बुदि़ध विलासी को आखिर कन्हैया के भाषण में क्या नजर आ गया। हो सकता है वह अच्छा बोलता हो। उसकी जन अपील अच्छी हो, यह किसी के साथ भी हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि वह जेल से छूटकर आए और उसकी तारीफ में आप अपनी बुदि़ध की कीमत लगा दो।
यह सही है कि दिल्ली और बिहार में अरविंद केजरीवाल और नीतीश कुमार को अप्रतिम सफल्ता मिली है फिर भी राष्टृीय राजनीति में आप वर्तमान सरकार और उसके काम को खारिज नहीं कर सकते। सरकार के आने के बाद सहिष्णुता बढ़ी है, घटी है, वैचारिक हमले बढ़े हैं या घटे हैं, यह एक अलग विषय हो सकते हैं और इसके लिए सिर्फ सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए हमारा समाज अधिक जिम्मेदार है। हर बात के लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोई भी सरकार हो, उसका हर फैसला तो गलत नहीं हो सकता न। चाहे वो मनमोहन सिंह की ही सरकार क्यों न हो। जैसा कि वरिष्ठ या बुजुर्ग बताते हैं, उससे गई गुजरी सरकार आजादी के बाद से अब तक नहीं बनी थी, तब भी कुछ तो अचछे काम उसके नाम होंगे। वर्तमान सरकार कितनी भी गई गुजरी होगी लेकिन मनमोहन सरकार से तो अच्छी ही है। नहीं मानना आपकी समस्या हो सकती है पर ये देश की समस्या नहीं हो सकती।
कन्हैया का मामला अब भी कोर्ट में विचाराधीन है पर उसे जमानत मिल जाने के बाद से ही ऐसा महसूस कराया जा रहा है कि वह बेदाग छूट गया। कोर्ट उसे सजा देगी, नहीं देगी लेकिन मीडिया और राजनीतिक दलों का एक तबका उसे अभी से ही बरी मानकर चल रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे जमानत देते हुए तमाम एहतियात बरतने की ओर इशारा भी किया था पर कन्हैया कहां मानने वाला है। जेल से बाहर कदम रखते ही उसके कदम फॉर्च्यूजर गाड़ी में पड़े और फिर मीडिया के कैमरे उसकी आंखों को चौंधियाने लगे। कैमरे का नशा कोई कब तक बर्दाश्त करेगा, इसलिए कन्हैया भी आतुर हो गया और अनाप शनाप बयानबाजी पर उतर आया। इसके पीछे भी राजनीतिक दलों और मीडिया के बड़े तबके का हाथ जरूर होगा। हालांकि वह ऐसा नहीं भी करता तो भी उसका राजनीतिक कैरियर तो जेल जाने के बाद से चमकता दिखने लगा है पर आवश्यकता से अधिक बयानबाजी उस पर भारी पड़ सकती है। तमाम जिलों में उसके खिलाफ सेना पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में मुकदमे दर्ज हो गए हैं। हमें भी सोचना चाहिए कि हम किसका साथ दे रहे हैं। नरेंद्र मोदी का विरोध करना है, बेशक करें पर इसका मतलब ये तो नहीं कि कन्हैया और उमर खालिद में अपना भविष्य देखने लगें। इतने भी विकल्पहीन नहीं हैं हम। जरूरत बस उचित विकल्प तलाश करने की है जे बासे के बीच में।
kanhaiya ka sath dena .. apne desh se gaddari karna jo bhi kanahaiya ka sath de rahe hain vo desh ke gaddar hi kahalayenge.... vo chahe kitna hi jor laga lenn...
जवाब देंहटाएंकन्हैया से यारी मुल्क से गद्दारी ।बधाई!
जवाब देंहटाएंकन्हैया से यारी मुल्क से गद्दारी ।बधाई!
जवाब देंहटाएं