द्वापर युग में कन्हैया के पापा जेल गए थे। तब कंस का राज था। अब कलयुग में स्वयं 'कन्हैया' को ये दिन देखना पड़ रहा है। अभी यहाँ मोदीराज है। तब स्थितियां अलग थीं और अब के हालात अलग। नाम का लोचा फंस रहा है। कन्हैया यहां कथित तौर पर खलनायक है पर समय बीतने के साथ उसकी खलनायकी संजय दत्त की तरह निखरकर नायक वाली बन रही है। काफी अंतर्विराेध है। सब कुछ द्वापर युग की तरह तय नहीं है, जैसा कि हम ग्रंथों और टीवी चैनलों के माध्यम से जान पाए हैं। वर्षों बाद जब इस समय का इतिहास लिखा जाएगा तो लोगों के विचारों में मोदी और कन्हैया को लेकर वो साम्य नजर नहीं आएगा।
नौ फरवरी की रात ऐतिहासिक हो गई है। उस रात के अंधेरे से एक चिराग पैदा हुआ है। उस चिराग की चकाचौंध विचित्र है। उसकी विचित्रता आधा गिलास खाली और आधा भरा हुआ टाइप है। हाल में बनी उसकी छवि सर्वस्वीकार्य नहीं है। अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि उसका उभार प्राकृत्रिक है या कृत्रिम। उभार के बाद का उभार तो कृत्रिम है यानी मीडिया की माइकें और लाइट, कैमरा और एक्शन फेयर एंड लवली टाइप हैं। हाल में एक नेता ने संसद में फेयर एंड लवली का जोर शोर से प्रचार किया था। खैर, मुद़दे पर आते हैं। कन्हैया के उभार की कथानक एक असहजता का बोध कराती है। इतनी जल्दी, ऐसे में इतना कैसे। तमाम सवाल हैं। सवालों के जवाब भी हैं और जवाबों के तमाम प्रकार। जितनी मुंह, उतनी बातें। पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा होगा- जो दिखता है, वो सही नहीं है। वह पोस्ट यहां पर चरितार्थ हो रहा है। जो दिख रहा है कि पुलिस या उसके पीछे की सरकार ने उसे उठवा लिया। कोर्ट में उसे मारा पीटा गया आदि आदि अधूरे सत्य हैं। मुझे यह बताने में कोई संकोच नहीं हो रहा है कि ऐसा जान-बूझकर किया गया ताकि वामपंथ के डूबते अस्तित्व को तिनके का सहारा मिल सके।
अब आप मुझे अति आश्चर्यवादी कह सकते हैं या इस लेख को अतिशय उक्ति बताकर खारिज कर सकते हैं लेकिन आप यकीन मानिए कि आप अधूरा सत्य जानते हैं। अब आप सवाल पूछेंगे कि दक्षिणपंथ ऐसा क्यों चाहेगा। आपका सवाल बिल्कुल वाजिब होगा पर आप यह भी सोचिए कि कहीं भी अकेला वामपंथ नहीं होता और कहीं भी अकेला दक्षिणपंथ नहीं होता। दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी के साथ साथ एक दूसरे के पूरक भी हैं। अब आते हैं राजनीतिक मुद़दे पर। पिछले कई महीनों से राहुल गांधी विपक्ष् के एकमात्र नेता बन रहे थे। बाकी विपक्ष उनके बैनर के नीचे था या नहीं था। सरकार काफी दिनों से प्रयास में थी कि विपक्ष राहुल गांधी की छतरी के नीचे न जाए पर ऐसा होता दिख नहीं रहा था और हाल फिलहाल भी ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा लेकिन इससे वामपंथ को एक संजीवनी मिली है। भविष्य का एक चेहरा मिला है, एक मुद़दा मिला है, जिस पर वामपंथ संघर्ष कर सकता है। ज्योति वसु और माणिक सरकार के बाद समुचे वामपंथ के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं था, जो पार्टी को आगे ले जा सके। हरकिशन सिंह सुरजीत, प्रकाश करात, सीताराम ऐचुरी, एबी वर्धन, डी राजा के पास न तो कोई विजन है और न ही ये चमकदार चेहरे हैं, जो कार्यकर्ताओं के चेहरे पर मुस्कान ला सकें। ये लोग पिछले दरवाजे के मजबूत खिलाड़ी हैं। पढ़े-लिखे हैं, अच्छे वक्ता हैं पर शायद प्रधानी का चुनाव भी हार जाएं। यहां आप मुझे वामपंथ को लेकर असहिष्णु कह सकते हैं और कहिए भी पर इन तथ्यों को आप नकार नहीं सकते। कांग्रेस दस साल तक नकारती रही कि मनमोहन सिंह पिछले दरवाजे से आए मजबूत प्रधानमंत्री हैं लेकिन सरकार जाते ही तरह तरह की किताबों ने उनकी 'मजबूती' का किला ढहा दिया।
आपको भूलना नहीं चाहिए कि भाजपा पहली बार पश्चिम बंगाल में मजबूती से चुनाव में उतर रही है। वहां चुनाव में तभी फायदा मिल सकता है, जब वाम और तृणमूल के वोट बंट जाएं। इसके लिए जरूरी था कि वाम का उभार हो। कन्हैया का उभार इसी रणनीति का परिचायक है। राजनीति में कुछ मोहरे ऐसे सेट किए जाते हैं, जिसका रिजल्ट आने में महीनों, वर्षों लग सकते हैं। इसके कई उदाहरण सामने हैं। द्वितीय विश्वयुद़ध के बाद से अमेरिका रूस को तोड़ने की कोशिश में लगा रहा पर इसका रिजल्ट 80 के दशक में सामने आया। यह मात्र उदाहरण है। इसमें अधिक दिमाग लगाने की जरूरत नहीं। अरविंद केजरीवाल की वर्षों की मेहनत उन्हें अंतत सत्ता तक ले गई। हालांकि उनके पीछे कौन था, कौन नहीं था यह अभी क्लीयर नहीं हो पाया है और होगा भी नहीं। क्योंकि यहां सभी को राजनीति करनी है, करने दीजिए। कोई पुरानी राजनीति करता है, कोई वाम राजनीति, तो कोई दक्षिणपंथ की राजनीति करता है। अब तो नए जमाने की राजनीति भी शुरू हो गई है। अभी शायद स्मार्ट राजनीति की शुरुआत बाकी है। उम्मीद है कन्हैया और उसकी पीढ़ी स्मार्ट राजनीति करेंगे। फिलहाल आप वाम और दक्षिण के झगड़े के बीच टीवी पर चल रही मगजमारी में अपना दिमाग खपाइए। तरह तरह की वाहियात बतकही से अपना ज्ञान बढ़ाइए और कन्हैया को 'रास' रचाने दीजिए जे बासे के बीच में।
अब आप मुझे अति आश्चर्यवादी कह सकते हैं या इस लेख को अतिशय उक्ति बताकर खारिज कर सकते हैं लेकिन आप यकीन मानिए कि आप अधूरा सत्य जानते हैं। अब आप सवाल पूछेंगे कि दक्षिणपंथ ऐसा क्यों चाहेगा। आपका सवाल बिल्कुल वाजिब होगा पर आप यह भी सोचिए कि कहीं भी अकेला वामपंथ नहीं होता और कहीं भी अकेला दक्षिणपंथ नहीं होता। दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी के साथ साथ एक दूसरे के पूरक भी हैं। अब आते हैं राजनीतिक मुद़दे पर। पिछले कई महीनों से राहुल गांधी विपक्ष् के एकमात्र नेता बन रहे थे। बाकी विपक्ष उनके बैनर के नीचे था या नहीं था। सरकार काफी दिनों से प्रयास में थी कि विपक्ष राहुल गांधी की छतरी के नीचे न जाए पर ऐसा होता दिख नहीं रहा था और हाल फिलहाल भी ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा लेकिन इससे वामपंथ को एक संजीवनी मिली है। भविष्य का एक चेहरा मिला है, एक मुद़दा मिला है, जिस पर वामपंथ संघर्ष कर सकता है। ज्योति वसु और माणिक सरकार के बाद समुचे वामपंथ के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं था, जो पार्टी को आगे ले जा सके। हरकिशन सिंह सुरजीत, प्रकाश करात, सीताराम ऐचुरी, एबी वर्धन, डी राजा के पास न तो कोई विजन है और न ही ये चमकदार चेहरे हैं, जो कार्यकर्ताओं के चेहरे पर मुस्कान ला सकें। ये लोग पिछले दरवाजे के मजबूत खिलाड़ी हैं। पढ़े-लिखे हैं, अच्छे वक्ता हैं पर शायद प्रधानी का चुनाव भी हार जाएं। यहां आप मुझे वामपंथ को लेकर असहिष्णु कह सकते हैं और कहिए भी पर इन तथ्यों को आप नकार नहीं सकते। कांग्रेस दस साल तक नकारती रही कि मनमोहन सिंह पिछले दरवाजे से आए मजबूत प्रधानमंत्री हैं लेकिन सरकार जाते ही तरह तरह की किताबों ने उनकी 'मजबूती' का किला ढहा दिया।
आपको भूलना नहीं चाहिए कि भाजपा पहली बार पश्चिम बंगाल में मजबूती से चुनाव में उतर रही है। वहां चुनाव में तभी फायदा मिल सकता है, जब वाम और तृणमूल के वोट बंट जाएं। इसके लिए जरूरी था कि वाम का उभार हो। कन्हैया का उभार इसी रणनीति का परिचायक है। राजनीति में कुछ मोहरे ऐसे सेट किए जाते हैं, जिसका रिजल्ट आने में महीनों, वर्षों लग सकते हैं। इसके कई उदाहरण सामने हैं। द्वितीय विश्वयुद़ध के बाद से अमेरिका रूस को तोड़ने की कोशिश में लगा रहा पर इसका रिजल्ट 80 के दशक में सामने आया। यह मात्र उदाहरण है। इसमें अधिक दिमाग लगाने की जरूरत नहीं। अरविंद केजरीवाल की वर्षों की मेहनत उन्हें अंतत सत्ता तक ले गई। हालांकि उनके पीछे कौन था, कौन नहीं था यह अभी क्लीयर नहीं हो पाया है और होगा भी नहीं। क्योंकि यहां सभी को राजनीति करनी है, करने दीजिए। कोई पुरानी राजनीति करता है, कोई वाम राजनीति, तो कोई दक्षिणपंथ की राजनीति करता है। अब तो नए जमाने की राजनीति भी शुरू हो गई है। अभी शायद स्मार्ट राजनीति की शुरुआत बाकी है। उम्मीद है कन्हैया और उसकी पीढ़ी स्मार्ट राजनीति करेंगे। फिलहाल आप वाम और दक्षिण के झगड़े के बीच टीवी पर चल रही मगजमारी में अपना दिमाग खपाइए। तरह तरह की वाहियात बतकही से अपना ज्ञान बढ़ाइए और कन्हैया को 'रास' रचाने दीजिए जे बासे के बीच में।
कमाल का मिश्राजी। अन्दर तक पैठ गए हैं।
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