नए साल के पहले हफ्ते में ही हुईं दो बड़ी घटनाओं से देश दहल गया। एक तरफ पठानकोट एयरबेस पर आतंकियों ने हमला कर दिया तो दूसरी ओर पश्चिम बंगाल के मालदा शहर में हज़ारों की भीड़ ने प्रदर्शन करने के बाद आतंक मचाना शुरू कर दिया। थाने में आग लगा दी गयी। कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया। जो सामने मिला उसे लतियाया जुतियाया गया। एक तरफ पठानकोट एयरबेस पर हमले को 24×7 कवरेज दिया जा रहा था। जो नहीं दिखाना चाहिए था वो भी दिखाया जा रहा था। जो नहीं बताना चाहिए वो भी बताया जा रहा था। दूसरी ओर मालदा की घटना से देश अनजान था क्योंकि मीडिया वाले उस घटना को पचा गए। उस खबर को पी गए।
अब सवाल उठता है कि देश के लिए बड़ा खतरा कौन है? प्रतीकात्मक नजरिये से देखेंगे तो पठानकोट एयरबेस पर हमला बड़ा है लेकिन खतरे के नजरिये से देखें तो दोनों घटनाओं के चरित्र में कोई खास फर्क नहीं है। दोनों ही घटनाएं देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाली थीं। दोनों ही घटनाओं का उद्देश्य दहशत का खेल खेलना ही था। आतंकवाद की शिकायत तो पाकिस्तान, अमेरिका, चीन, रूस या यूएन से कर लेंगे लेकिन देश के अंदर जो धार्मिक ज्वार उमड़ रहा है, उसका क्या करेंगे? आतंकवादियों को तो मार गिरा दिया गया लेकिन मालदा के कालिया चौक थाने के सामने 'जिहाद' का जो नंगा नाच हुआ उसका क्या? हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ऐसी ही भीड़ ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को तहस नहस कर दिया था। वैसे भी जिस मुद्दे को लेकर मालदा में हथियारों के डैम पर विरोध प्रदर्शन हुआ, दरअसल वो मुद्दा ही नहीं है। नबी की शान में गुस्ताखी करने वाला कमलेश तिवारी जेल में है। अब क्या चाहिए? उसे क्या फांसी पर लटकाया जाएगा। यहाँ क्या शरीयत कानून चलता है? तुरंत कार्यवाई होने के बाद भी कभी बिजनौर तो कभी बरेली में हज़ारों की तादाद में लोग इकठ्ठा होकर कमलेश तिवारी को फाँसी देने की मांग कर रहे हैं। यही आग धीरे धीरे मालदा पहुँच गई और बर्बादी का नंगा नाच खेला गया। कमलेश तिवारी के मुद्दे पर इकठ्ठा होने वाले लोग तब कहाँ रह जाते हैं, जब जनगणना की रिपोर्ट में कहा जाता है कि देश में सबसे पिछड़े लोग उन्ही में से हैं।
मालदा के कालिया चौक के पास के थाने में स्टाफ के बैठने की जगह नहीं बची है। थाने के रिकॉर्ड भस्म हो गए हैं। आसपास के लोगों का दर्द सुननेवाला कोई नहीं है। इलाके में कर्फ्यू लगा है। जिस पार्टी के कई नेता आतंकवाद को शरण देने के आरोप में एनआईए के राडार पर हैं उस पार्टी के राज में तो ये होना ही था। चुनाव सर पर है इसलिए भी धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए ऐसा होना जरुरी था।
इस घटना में दूसरी जो सबसे चिंताजनक बात उभरी वो है न्यूज़ चैनलों की तुष्टिकरण की नीति। नेताओं को तुष्टिकरण को लेकर गाली देते देते ये सब भी तुष्टिकरण की नीति पर चलने लगे। दूसरों से सवाल पूछने वाले खुद सवालों के घेरे में आ गए। इस सूचना तकनीक के ज़माने में ये तो कहना गलत होगा कि सूचना नहीं मिली होगी। ये बात सही भी हो तो इतना तो है कि जब सूचना आम हो जाए तब उसे चला देते। खबर को पीने का कोई तो मतलब होगा। एक बात निकलकर आ रही है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खबर फ़्लैश नहीं होने दिया। अरे वाह! ये तो बहुत बड़ी मीडिया मैनेजर निकलीं। इसी साल वहां चुनाव होने हैं, लिहाजा ममता बनर्जी ने खबर दबा दिया। ये परदे की बात है कि बदले में किसको क्या मिला? जो मिलेगा अच्छा ही मिलेगा वर्ना ऐसे कोई अपना पेशा थोड़े बेचता है। मशहूर शायर सुनील लिखते हैं:
बहाना मत कर कि तुझे कुछ पता नहीं था।
हमें पता है तुझे वो भी पता है जो किसी को पता नहीं।।
अब हमें पता चला है कि तू झूठ बोल रहा था।
तुझे सब पता था पर तूने अपने 'पते' का सौदा कर लिया।।
अब सवाल उठता है कि देश के लिए बड़ा खतरा कौन है? प्रतीकात्मक नजरिये से देखेंगे तो पठानकोट एयरबेस पर हमला बड़ा है लेकिन खतरे के नजरिये से देखें तो दोनों घटनाओं के चरित्र में कोई खास फर्क नहीं है। दोनों ही घटनाएं देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाली थीं। दोनों ही घटनाओं का उद्देश्य दहशत का खेल खेलना ही था। आतंकवाद की शिकायत तो पाकिस्तान, अमेरिका, चीन, रूस या यूएन से कर लेंगे लेकिन देश के अंदर जो धार्मिक ज्वार उमड़ रहा है, उसका क्या करेंगे? आतंकवादियों को तो मार गिरा दिया गया लेकिन मालदा के कालिया चौक थाने के सामने 'जिहाद' का जो नंगा नाच हुआ उसका क्या? हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ऐसी ही भीड़ ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को तहस नहस कर दिया था। वैसे भी जिस मुद्दे को लेकर मालदा में हथियारों के डैम पर विरोध प्रदर्शन हुआ, दरअसल वो मुद्दा ही नहीं है। नबी की शान में गुस्ताखी करने वाला कमलेश तिवारी जेल में है। अब क्या चाहिए? उसे क्या फांसी पर लटकाया जाएगा। यहाँ क्या शरीयत कानून चलता है? तुरंत कार्यवाई होने के बाद भी कभी बिजनौर तो कभी बरेली में हज़ारों की तादाद में लोग इकठ्ठा होकर कमलेश तिवारी को फाँसी देने की मांग कर रहे हैं। यही आग धीरे धीरे मालदा पहुँच गई और बर्बादी का नंगा नाच खेला गया। कमलेश तिवारी के मुद्दे पर इकठ्ठा होने वाले लोग तब कहाँ रह जाते हैं, जब जनगणना की रिपोर्ट में कहा जाता है कि देश में सबसे पिछड़े लोग उन्ही में से हैं।
मालदा के कालिया चौक के पास के थाने में स्टाफ के बैठने की जगह नहीं बची है। थाने के रिकॉर्ड भस्म हो गए हैं। आसपास के लोगों का दर्द सुननेवाला कोई नहीं है। इलाके में कर्फ्यू लगा है। जिस पार्टी के कई नेता आतंकवाद को शरण देने के आरोप में एनआईए के राडार पर हैं उस पार्टी के राज में तो ये होना ही था। चुनाव सर पर है इसलिए भी धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए ऐसा होना जरुरी था।
इस घटना में दूसरी जो सबसे चिंताजनक बात उभरी वो है न्यूज़ चैनलों की तुष्टिकरण की नीति। नेताओं को तुष्टिकरण को लेकर गाली देते देते ये सब भी तुष्टिकरण की नीति पर चलने लगे। दूसरों से सवाल पूछने वाले खुद सवालों के घेरे में आ गए। इस सूचना तकनीक के ज़माने में ये तो कहना गलत होगा कि सूचना नहीं मिली होगी। ये बात सही भी हो तो इतना तो है कि जब सूचना आम हो जाए तब उसे चला देते। खबर को पीने का कोई तो मतलब होगा। एक बात निकलकर आ रही है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खबर फ़्लैश नहीं होने दिया। अरे वाह! ये तो बहुत बड़ी मीडिया मैनेजर निकलीं। इसी साल वहां चुनाव होने हैं, लिहाजा ममता बनर्जी ने खबर दबा दिया। ये परदे की बात है कि बदले में किसको क्या मिला? जो मिलेगा अच्छा ही मिलेगा वर्ना ऐसे कोई अपना पेशा थोड़े बेचता है। मशहूर शायर सुनील लिखते हैं:
बहाना मत कर कि तुझे कुछ पता नहीं था।
हमें पता है तुझे वो भी पता है जो किसी को पता नहीं।।
अब हमें पता चला है कि तू झूठ बोल रहा था।
तुझे सब पता था पर तूने अपने 'पते' का सौदा कर लिया।।
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