बिहार मतलब राजनीति की प्रयोगशाला। आज़ादी के बाद से अमूमन राजनीति के सभी प्रयोग बिहार में ही हुए हैं। इन प्रयोगों से जो निष्कर्ष निकला, उससे देश का तो कही न कही भला हो गया पर निरंतर प्रयोगों से प्रयोगशाला रूपी बिहार की 'परखनली' सड़ गयी प्रतीत होती है। बिहार उस कम्पास की तरह हो गया, जो दूसरों को दिशा दिखाते दिखाते खुद दिशाहीन हो गया। प्रयोगकर्ताओं ने बिहार के लोगों के मन में ये सफलतापूर्वक भर दिया कि तुम बिहार के हो तो तुर्रम खान हो। ऐसा इसलिए किया गया ताकि लोग दम्भ में चूर हो जाएँ। क्योंकि दम्भ में चूर व्यक्ति किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता। वो खुद को दाता समझने लगता है। राजनेताओं के लिए प्रयोग दर प्रयोग यह आसान होता गया। बिहार के लोगों ने कभी नेताओं के आगे अपनी झोली नहीं फैलाई और आवश्यकता से अधिक स्वाभिमान के बोझ तले दबे रहे और राजनेता मौज करते रहे।
अमूमन बिहार के लोगों को राजनितिक दृष्टि से अधिक संवेदनशील माना जाता है। यह भी लोगों को दम्भित करने का सिला है, जो बहुत ही सोच समझकर किया गया। नहीं तो इसके पीछे का कोई वैज्ञानिक या भौगोलिक कारण उपलब्ध नहीं है। दरअसल बिहार के लोगों को आत्ममुग्धता के शिखर पर पहुंचा दिया गया है। बिहार के किसी भी आदमी से राजनीति के बारे में पूछिये, वह मुस्कुराते हुए, खुद पे इतराते हुए वो सब भी बता देगा जो आपने पूछा भी नहीं होगा। चाहे वह पान की दुकान वाला ही क्यों न हो। आत्ममुग्धता के रेस में वो इतने आगे हैं कि उन्हें आसानी से रिवर्स गियर में नहीं लाया जा सकता। ये जड़ें गहराई तक पसर गयी हैं।
आप पूछ सकते हैं कि ये सब लिखने पढ़ने के पीछे क्या कारण है? तो मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि लालू प्रसाद यादव की जीत मैं पचा नहीं पा रहा हूँ। इसलिए गहन विश्लेषण कर रहा हूँ। आप इस बहाने मेरी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़ा कर सकते हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी पर इस विश्लेषण पर आप भी गौर फरमाइयेगा। जेपी आंदोलन से बिहार को क्या मिला- लालू प्रसाद यादव। मंडल कमीशन से बिहार को क्या मिला- लालू प्रसाद यादव। आडवाणी की गिरफ़्तारी से बिहार को क्या मिला- लालू प्रसाद यादव। और अभी अखंड गठबंधन से बिहार को क्या मिला- वही लालू प्रसाद यादव। क्या करें इस लालू प्रसाद यादव का? दूसरे लोग बहुत बुरे हो सकते हैं तो भी अच्छे होंगे लेकिन इस चुनाव में भी वही स्वाभिमान की कसौटी पर बिहार को कस दिया गया और फिर हुआ वही- जो है सो हम ही हैं।
अहम् ब्रम्हा की तर्ज़ पर बिहार के लोगों में अहम् बिहारी का मंत्र भर दिया जाता है और फिर झूठ का स्वाभिमान जगाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कोई भी आदमी शिक्षा, सुरक्षा, सड़क, बिजली, पानी आदि की मांग न करे और स्वाभिमान के नाम पर वोट करे। जिसके राज में चरवाहा विद्यालय खुला, जिसके राज में आईएएस अपनी बीवी की आबरू बचाने की भीख मांगता हो, जिसके राज में डाकू को घेरे एसपी से उसे छोड़ने को कहा जाए, जिसके राज में डीएम को सरेआम मार दिया जाए, एसपी को मारने की कोशिश की जाए, आशिक के सामने उसकी महबूबा से बलात्कार किया जाए, उच्च शिक्षा मंत्री सुबह सवेरे मौत के घाट उतार दिए जाएँ, सत्ताधारी दल का सांसद किसी पर तेज़ाब फेंक दे, उस राज्य का तो भगवान ही मालिक हो सकता है। अब इस सरकार में लालू यादव बड़े भैया की हैसियत लेकर बैठे हैं तो आप सुशासन की उम्मीद क्या खाक करेंगे। इस सरकार में लालू यादव की हैसियत वही है जो मनमोहन सरकार में सोनिया गांधी की होती थी। आप मानिए या न मानिए जे बासे के बीच में।
कमबख्त कौन कहता है बिहार में नीतीश सरकार है।
वहां तो लालू का राज अब भी बरकरार है।।
अमूमन बिहार के लोगों को राजनितिक दृष्टि से अधिक संवेदनशील माना जाता है। यह भी लोगों को दम्भित करने का सिला है, जो बहुत ही सोच समझकर किया गया। नहीं तो इसके पीछे का कोई वैज्ञानिक या भौगोलिक कारण उपलब्ध नहीं है। दरअसल बिहार के लोगों को आत्ममुग्धता के शिखर पर पहुंचा दिया गया है। बिहार के किसी भी आदमी से राजनीति के बारे में पूछिये, वह मुस्कुराते हुए, खुद पे इतराते हुए वो सब भी बता देगा जो आपने पूछा भी नहीं होगा। चाहे वह पान की दुकान वाला ही क्यों न हो। आत्ममुग्धता के रेस में वो इतने आगे हैं कि उन्हें आसानी से रिवर्स गियर में नहीं लाया जा सकता। ये जड़ें गहराई तक पसर गयी हैं।
आप पूछ सकते हैं कि ये सब लिखने पढ़ने के पीछे क्या कारण है? तो मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि लालू प्रसाद यादव की जीत मैं पचा नहीं पा रहा हूँ। इसलिए गहन विश्लेषण कर रहा हूँ। आप इस बहाने मेरी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़ा कर सकते हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी पर इस विश्लेषण पर आप भी गौर फरमाइयेगा। जेपी आंदोलन से बिहार को क्या मिला- लालू प्रसाद यादव। मंडल कमीशन से बिहार को क्या मिला- लालू प्रसाद यादव। आडवाणी की गिरफ़्तारी से बिहार को क्या मिला- लालू प्रसाद यादव। और अभी अखंड गठबंधन से बिहार को क्या मिला- वही लालू प्रसाद यादव। क्या करें इस लालू प्रसाद यादव का? दूसरे लोग बहुत बुरे हो सकते हैं तो भी अच्छे होंगे लेकिन इस चुनाव में भी वही स्वाभिमान की कसौटी पर बिहार को कस दिया गया और फिर हुआ वही- जो है सो हम ही हैं।
अहम् ब्रम्हा की तर्ज़ पर बिहार के लोगों में अहम् बिहारी का मंत्र भर दिया जाता है और फिर झूठ का स्वाभिमान जगाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कोई भी आदमी शिक्षा, सुरक्षा, सड़क, बिजली, पानी आदि की मांग न करे और स्वाभिमान के नाम पर वोट करे। जिसके राज में चरवाहा विद्यालय खुला, जिसके राज में आईएएस अपनी बीवी की आबरू बचाने की भीख मांगता हो, जिसके राज में डाकू को घेरे एसपी से उसे छोड़ने को कहा जाए, जिसके राज में डीएम को सरेआम मार दिया जाए, एसपी को मारने की कोशिश की जाए, आशिक के सामने उसकी महबूबा से बलात्कार किया जाए, उच्च शिक्षा मंत्री सुबह सवेरे मौत के घाट उतार दिए जाएँ, सत्ताधारी दल का सांसद किसी पर तेज़ाब फेंक दे, उस राज्य का तो भगवान ही मालिक हो सकता है। अब इस सरकार में लालू यादव बड़े भैया की हैसियत लेकर बैठे हैं तो आप सुशासन की उम्मीद क्या खाक करेंगे। इस सरकार में लालू यादव की हैसियत वही है जो मनमोहन सरकार में सोनिया गांधी की होती थी। आप मानिए या न मानिए जे बासे के बीच में।
कमबख्त कौन कहता है बिहार में नीतीश सरकार है।
वहां तो लालू का राज अब भी बरकरार है।।
Wakai, ye to laloo ki hi sarkar hai aur wohi jangalraj.
जवाब देंहटाएंशुक्रिया कि तुम्हारे अंदर का बिहारी नहीं जगा। नहीं तो दो चार गाली मुझे मिल जाती।
हटाएंWakai, ye to laloo ki hi sarkar hai aur wohi jangalraj.
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