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मैं निर्भया हूं


मैं निर्भया हूं। आपकी अपनी निर्भया। सर्द रातों में वहशी दरिंदों की शिकार निर्भया। वहशीपन भी ऐसा कि क्या कहूं। खैर, मैं दुनिया से रुखसत हो गई लेकिन फिर भी आप सबके बीच हूं। दिखावे के लिए ही सही, ‘16 दिसंबर’ अब सिर्फ एक फिल्म का नाम नहीं रहा। अब यह मेरे और मेरे जैसे कितनी पीड़िताओं के साथ हुए पाप का प्रायश्चित करने का एक दिन बन गया है। आप सब कितने अपनेपन से इस दिन मुझे याद करते हैं। इसी बहाने लड़कियों की सुरक्षा के नए-नए संकल्प लेते हैं। मुझे खुशी है कि मैं हजारों-लाखों लड़कियों की सुरक्षा के उपाय करने का जरिया बन गई हूं। मैं समझती हूं कि मेरा जीवन सफल हो गया। मेरी कुर्बानी जाया नहीं गई और कुछ अच्छे कामों को पूरा करने का बहाना बन गई है।

जैसा कि आप सब जानते हैं, मेरे साथ वहशीपन करने वाले दरिंदों में से तब एक नाबालिग भी था। मेरे साथ हुए पाप में वह बराबर का साझीदार था। आजकल वह  चर्चाओं में है। टीवी, सोशल मीडिया और अखबारों में अभी एक बहस चल पड़ी है। उसे छोड़ा जाना चाहिए कि नहीं। उसने जो पाप किया था, उसकी सजा तो अधिक है पर नाबालिग होने के कारण उसे सजा कम हुई और वह बाहर निकल रहा है। इसी को लेकर हायतौबा मची हुई है। मेरे मम्मी-पापा भी नहीं चाहते कि वह नाबालिग बाहर निकले। कौन नहीं चाहेगा कि बेटी के दुराचारी को फांसी हो। मुझे अच्छा लगता है कि देश में लड़कियों की सुरक्षा को लेकर एक संजीदगी पैदा हुई है लेकिन इस मामले में आपलोग चूक गए। चलो, इस आरोपी को तो छूटना ही था, क्योंकि तब के कानून के मुताबिक ही किसी को सजा दी जा सकती है। लेकिन इन तीन सालों में गंभीरतम अपराध करने वालों के खिलाफ आप कानून बना सकते थे। याद रखिए, ऐसे अपराधी सिर्फ अपराधी नहीं होते, वे विकृत होते हैं और अपराध भी वे विकृत तरीके से ही करते हैं।

अब हाय हाय मत करिए। अगर आप गंभीर हैं तो एक कानून बना लीजिए, ताकि कम उम्र की आड़ में अपराधी ऐसे ही बाहर न होते चले जाएं। नहीं तो हर 16 दिसंबर को एक मोमबत्ती जलाते रहिए। मोमबत्ती जला देने मात्र से आप क्या संदेश देना चाहते हैं। मेरी आत्मा की शांति के लिए ऐसा मत करिए। जो जिंदा है, उसकी सुरक्षा के लिए तो आप कुछ कर ही नहीं रहे हैं और चले हैं मेरी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने। कल मेरे साथ ऐसा हुआ था तो कल किसी और के साथ होगा। मेरे साथ हुई घटना अंतिम नहीं है। उसी दिल्ली में आठ साल, चार साल की बच्चियों के साथ रोजाना वहशीपन की वारदात हो रही है। क्या कर रहे हैं आप?  मेरे साथ हुए हादसे के बाद तो आपने पहाड़ उठा लिया था, अब आपको क्यों सांप सूंघ गया?

हो गई है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

टिप्पणियाँ

  1. आपकी वेदना जायज है। गंभीर कानून नहीं बना तो इस हैवानियत पर लगाम लग पाना मुश्किल होगा।

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