रफ्तार के बाजार में हमने कितनी लेट एंट्री मारी है? ऐसे लग रहा है जैसे आधा से अधिक सिलेबस खत्म होने के बाद किसी छात्र ने क्लास में एडमिशन लिया है। हम खुद को 21वीं सदी का देश मान रहे हैं, पूरे विश्व का नेतृत्व करने का दंभ भर रहे हैं। अमेरिका, चीन और जापान को पीछे छोड़ने की बात कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन के सामने खड़े होने को बेकरार हैं लेकिन.....। यह लेकिन बहुत बड़ा लेकिन है। क्या हम अमेरिका और बाकी देशों के बराबर खड़े भी हो पाए हैं। क्या विश्व हमें अपना नेता केवल इसलिए मान ले कि हमारे यहां कभी कोहिनूर था और हमारे देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। या केवल इस बात के लिए विश्व हमें नमन करे कि यहां कभी नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय होते थे। क्या हम इसलिए सरदार हो गए हैं कि हमारे पास विश्व की दूसरी सबसे अधिक जनसंख्या है। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो गलत हैं। हम ऐसा तभी कर पाएंगे जब हम उनकी बराबरी करेंगे, विकास करेंगे। हमारा रहन-सहन भी विश्वस्तरीय होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हम नाहक मूंगेरीलाल के हसीन सपने देखते रहेंगे। रफ्तार के बाजार की कसौटी पर अगर देश को आंकें तो हम खुद को बांगलादेश से थोड़ा ही आगे पाते हैं। अब सोचिए हम कहां हैं?
ऐसे ही सवाल उठे थे जब दिल्ली में मेट्रो को मंजूरी दी गई थी। विरोधी दल इसे खास लोगों की सुविधा बताकर आलोचना किया करते थे। आज जब दिल्ली, जयपुर आदि शहरों में मेट्रो साकार हो चुका है। मेट्रो से दिल्ली और अन्य महानगरों की ट्रैफिक की हालत कैसे सुधरी है, यह किसी से बताने की जरूरत नहीं है और न ही इसकी आलोचना करने वालों से सर्टिफिकेट लेने की जरूरत है। आज बिना मेट्रो के कोई दिल्ली के बारे में सोच सकता है। अंदाजा लगाइए, अगर दिल्ली में आज मेट्रो न होता तो ट्रैफिक की क्या हालत होती? वहां का जनजीवन कैसा होता? रह तो हम बिना मेट्रो के भी रहे थे, जैसे बिना बुलेट ट्रेन के रह रहे हैं। काम तो हम साइकिल से भी चला रहे थे फिर मोटरसाइकिल की क्या जरूरत आन पड़ी? काम तो हम सामान्य मोबाइल फोन से भी चला रहे थे पर क्यों हम स्मार्ट फोन पर शिफ्ट हो गए? जब हमने अपना मोबाइल स्मार्ट कर लिया तो सफर स्मार्ट क्यों न हो? एक नई तरह की सवारी है। कल्पना करिए भारतीय रेल और चीन या जापान के बुलेट ट्रेन का फ्यूजन कितना जबर्दस्त होगा। इसे आप कॉकटेल भी कह सकते हैं। इसका सुरूर आने दीजिए। हम बुलेट ट्रेन की सवारी करना चाहते हैं। आप वाहियात बहाना बनाकर हमसे इसका हक नहीं छीन सकते।




जबर्दस्त
जवाब देंहटाएंबुलेट ट्रेन के बजाए मौजूदा रेल व्यवस्था को बेहतर कर दें तो बेहतर है। जिस दिन रेल मंत्रालय स्टेशन की चाय को दुरुस्त कर दे उस दिन देश में बुलेट टे्रन ही चलेगी।
जवाब देंहटाएंBahut khub
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
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