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मुसलमान बुद्धिजीवी ही मुस्लिमों के सबसे बड़े दुश्मन




ये बात हम क्यों कह रहे हैं? इसको समझना होगा। किसी भी मुस्लिम बुद्धिजीवी से बात करो तो वो कौम की बात पहले करता है, समाज या व्यक्ति विशेष की बात बाद में। मुस्लिमों में यह बात भर दी गयी है कि कौम की तरक्की में ही उनकी तरक्की है। कोई मुस्लिम बुद्धिजीवी यह बात कहने का साहस नहीं करता कि व्यक्ति की तरक्की में समाज की तरक्की है और समाज की तरक्की में देश की तरक्की है।

कौम की तरक्की की बात करने से चंद कठमुल्ले फायदा उठा ले जाते हैं और आम मुसलमान इसी बात से खुश हो जाता है कि उसके कौम की तरक्की की बात हो रही है। उसे तनिक भी भान नहीं होता कि वह ठग लिया गया। टीवी पर भी मुसलमानों के मसाइल पर किसी प्रोफेसर या समाजशास्त्री को चर्चा के लिए नहीं बुलाया जाता। वहां पर भी कठमुल्लों का सिक्का चलता है। मुसलमानों से बाहर की दुनिया भी मानकर चलती है कि कठमुल्ले ही मुस्लिम मसाइल पर बेहतर चर्चा कर सकते हैं। जाहिर है कोई विद्वान वो बात नहीं कर पायेगा जो कठमुल्ला कर सकता है और धर्म के नाम पर बरगला सकता है।

इसी कारण सीरिया, यमन, फलिस्तीन आदि देशों में हुई घटनाएं अपने यहाँ स्वाभाविक रूप से सुर्खियां बन जाती हैं और विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं। मुस्लिम राजनीति का प्रभाव देखिये कि कोई भी प्रधानमंत्री आज तक इस्राएल नहीं जा पाया। कनाडा में कार्टून बना, यहाँ फतवा जारी हो गया। शर्ली हेब्दो प्रकरण में पूरी दुनिया आतंकवाद का विरोध कर रही थी तो यहाँ घटना का मूल तलाशा जा रहा था। मुस्लिम राजनीति के चलते ही ओसामा यहाँ ओसामा जी कहा जाने लगा और सलमान रुश्दी या तस्लीमा नसरीन बेगाने हो गए। रुश्दी की किताब पर बैन लग गया। शाहबानो केस में संविधान संशोधन लाया गया और हिन्दू नाराज न हो तो मंदिर का ताला खोल दिया गया। मंदिर का ताला खोलने और बाबरी विध्वंस की नींव रखने वाले आज मुसलमानों के सबसे बड़े पैरोकार हैं।

मुस्लिम राजनीति का इससे बड़ा घृणित उदाहरण और क्या हो सकता है कि कश्मीरी पंडितों को जीते जी दोजख नसीब हो गया। आजतक वे न्याय के लिए दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रह रहे हैं। मुसलमान इसी से खुश हैं कि कश्मीरी पंडित दुर्दशा के शिकार हैं। हालाँकि उनके जीवन में भी रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ। आज तक किसी मुस्लिम रहनुमा ने खुलकर कश्मीरी पंडितों के दर्द पर मरहम नहीं लगाया। मुसलामानों को छोड़िये, उनकी राजनीति करने वाले हिन्दू भी उनकी सलामती जानने नहीं पहुंचे।

वक़्फ़ की सारी संपत्ति कुछ कठमुल्लों के हाथ में है और सत्ता के साथ मिलकर वे खूब गुलछर्रे उड़ा रहे हैं और आम मुसलमान इसी बात से खुश है कि कौम की तरक्की हो रही है। आजादी के पहले से शुरू हुई मुस्लिम राजनीति का लाभ आज तक आम मुसलमान तक नहीं पहुंचा और न ही वे इसके लिए तैयार हैं। अशिक्षा का आलम देखिये कि कठमुल्लों की एक आवाज पर कई जगह आम मुसलमान अपने बच्चों को पोलियो ड्राप तक नहीं पिलाते। असली बात ये है कि कठमुल्ले उन्हें जागरूक करना ही नहीं चाहते। उन्हें डर है कि अगर वे जागरूक हो गए तो उनकी दादागीरी पर ताला लग जायेगा।

राजनितिक रूप से आम मुसलमानों की राजनीति का ठेका कुछ हिन्दू नेताओं ने अपने सर उठा रखा है। इन हिन्दू नेताओं को इस बात का डर है कि मुसलमानों में कोई नेता पैदा हो गया तो उनकी राजनीति चौपट हो जायेगी। इसलिए वे क़यामत तक जाकर बयानबाजी करते हैं और किसी मुस्लिम नेता को पनपने से रोकते हैं।साथ ही अपने साथ कठमुल्लों की फ़ौज़ घुमाते हैं।

असहिष्णुता की बात सारे कठमुल्लों को एक साथ घर कर गई। सबको देश असहिष्णु लगने लगा। अभी देश भर में आईएसआई के जासूस पकडे जा रहे हैं तो कही से किसी को भी असहिष्णुता का बोध नहीं हो रहा है। अफ़सोस तो इस बात का है की असहिष्णुता की बात पर 'अतुल्य भारत' का सपना दिखाने वाले और 'ऐसा देश है मेरा' गीत गाने वाले भी उसी जमात में शामिल हो गए। वाह जी एक फ़िल्म पर अरबों लुटाने वाला देश एक झटके में असहिष्णु हो गया, क्योंकि कठमुल्लों की एक जमात ऐसा कह रही थी। बेचारा आम मुसलमान क्या करे जब अंग्रेजी दा बुद्धिजीवी मुसलमान ही उसका दुश्मन है। जिसे सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने को लेकर हंगामा मचाना चाहिए, वो तो असहिष्णुता का रोना रो रहे हैं। 

टिप्पणियाँ

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  2. एकदम सोलह आना सही। दरअसल बुद्धिजीवी होना और बुद्धिजीवी बनना दो अलग बातें हैं। ज्यादातर तो खुद को बुद्धिजीवी सिद्ध करने में लगे हैं। ऐसे में उन्हें अपनी जमात के व्यक्ति विशेष के विकास से क्या लेना-देना। उन्हें तो छिछले तर्कों-कुतर्कों से अनपढ़ भीड़ को अपने प्रभाव में लेना है। ताकि अपना अस्तित्व बनाए रख सकें। जमात ने विकास कर लिया तो उन्हें कौन पूछेगा?

    रही बात असहिष्णुता की तो ये तो वो ब्रह्मास्त्र समझ कर छोड़ा गया था, जिससे 60 साल की गुलामी को तोड़ती विचरधारा को पनपने से पहले ही तहस-नहस करना था लेकिन हाय रे मुकद्दर, ये ब्रह्मास्त्र मिर्ची पटाखा निकला। बेचारे 'सहिष्णु' कन्फ्यूज होने लगे तो देशभर में कुछ चचा लोग परेशान हो बैठे। तो और पावरफुल ब्रह्मास्त्र निकाल लाये और मुम्बई से छोड़ दिया। पहले एक चचा टीवी पर रोए, कुछ दिन बाद दुसरके चचा को देश सरिया लगने लगा। अब ये ड्रामा भी फ्लॉप हुआ तो बेचारी देश की 'बहू' और उनके पुत्र को खुलकर आना पड़ा। ये सहिष्णु लोग संसद को बपौती मान बैठे हैं। अब देखिये इन सहिष्णुओं की असहिष्णुता झेल रहे सदन को कब आजादी मिलेगी।

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