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आपका शो का बिजनेस है, शो कीजिए, हमारा दिल मत तोड़िए

आधी रात तक उधेड़बुन में था। सोच रहा था कि महीने दिन पहले जो शब्द लोग बोल नहीं पाते थे वो अचानक आम बोलचाल की भाषा कैसे हो गई? कैसे उसे लेकर ट्वीट पर ट्वीट किया जा रहा है। फेसबुक पर पक्ष और विपक्ष में पोस्टों की अचानक बाढ़ आ गई है। इस पर बहस करते लोग अपना-पराया, भाई-भाई, गुरु शिष्य परंपरा को भी भूल जा रहे हैं। एक तरह का साइबर वार चल रहा है। टीवी की बहस जिस शब्द के बिना पूरी नहीं हो रही है उस शब्‍द का नाम है असहिष्णुता। वाकई बहुत ही असहिष्णु शब्द है ये।

सुबह इसी शब्द के साथ नींद टूटी। हाथ मोबाइल को टटोलने लगा। सोचा कि इस विषय पर कुछ न कुछ नए पोस्ट या ट्वीट आए होंगे या रात के पोस्ट पर नए रिएक्शन आए होंगे। नोटिफिकेशन की लंबी लाइन लगी थी। एक एक कर देखने लगा। हर एक टवीट और हर एक पोस्ट पर तत्काल मन में रिएक्शन उभरते चले गए। आसपास का माहौल तो सहिष्णु था। बीवी चाय लेकर सामने थी और बच्चे अठखेलियां कर रहे थे। छोटी बेटी जय जय बजरंग बली वाला गाना गा रही थी। साथ ही बजरंगी भाईजान में मुन्नी के कैरेक्टर की मिमिक्री कर रही थी पर मेरा पूरा ध्यान मोबाइल पर टिका था। पत्नी के साथ चाय की चुस्की ली। रोज की तरह बच्चों के सामने मैं भी थोड़ी देर के लिए बच्चा बन गया पर जेहन में तो कुछ और ही घुमड़ रहा था। आज मन असहिष्णुता के पीछे पड़ गया था।

स्नान ध्यान करने के बाद घर से निकला। कोई काम नहीं था। मन असहिष्णुता की खोज में था। लिहाजा पग उठते गए। कॉलोनी के बाहर कोने पर दर्जी अरशद के पास से होकर गुजरा। दुआ सलाम हुई। शिष्टाचार में उसने दुकान में बुला लिया। चाय के लिए पूछा तो मैंने मना कर दिया। बातचीत होने लगी। शुरुआत उसने ही की- साहब, आजकल असहिष्णुता का बड़ा हल्ला है। वो भी असहिष्णुता का सही उच्चारण नहीं कर पाया। मेरे बोलने का इंतजार न करते हुए उसने फिर कहा- ये सब नेताओं के चोंचले हैं। कहीं असहिष्णुता नहीं है। सब बेकार की बातें हैं। मैंने कुछ कहा नहीं। बस उसकी हां में हां मिला दिया।

फिर निकलकर आगे बढ़ा। चौराहे के बाद सब्जीवाला भूपेंद्र की दुकान पर मैँ ठहर गया। बगल के खोखे में मैगजीन और पेपर की दुकान है। मैं एक मैगजीन लेकर बैठ गया। पन्ना पलटता रहा। ये असहिष्णुता क्या है भाई?  सब्जी वाले के सवाल से मेरी तंद्रा भंग हुई। फिर बोला- पूरो अखबार असहिष्णुता से पटो पड़ो है। पता नहीं, ई का है ससुरी? आदमी दिन भर रोजी रोटी में परेशान हैं और ई नेता सब हियां असहिष्णुता पर चिल्ल पों करो हैं। मैं उसे कुछ बता नहीं पाया। चाहता तो बता देता पर मैं उसे जानबूझकर इस शब्द के भंवरजाल में फंसाना नहीं चाहता था। बिना जाने वो टेंशन में है तो जान जाएगा तो कितना टेंशनिया जाएगा।

थोड़ा और आगे बढ़ा तो जूते-चप्पल के व्यापारी रहमान के फड़ पर ठहर गया। दोपहर से पहले का समय था। अभी ग्राहक नहीं थे उसके पास। मैँ भी बच्चों के लिए जूते-चप्पल देखने लगा। उसे पता है कि मैं अखबार में हूं तो उसने भी यही सवाल कर दिया। साहब, आजकल तो आमिर खान को लोग बहुत गालियां दे रहे हैं। मैंने कुछ न जानने के अंदाज में पूछा तो उसने आमिर खान वाला वाकया सुनाया। उसने फिर कहा- कहां सर असहिष्णुता है। यहां दिन निकलने के साथ ही आदमी दो पैसे कमाने में जुट जाता है। ये सब  शोशेबाजी है। वहां से आगे नहीं बढ़ा और मैं घर लौट आया।

शाम को ऑफिस आया तो पुराने साथी शरीफ भाई मिल गए। वे पीएफ क्लेम करने आए थे। गर्मजोशी के साथ गले मिले और बोले- आपलोगों को बहुत मिस करता हूं। कई संस्थान बदल चुका हूं पर आप लोगों जैसे स्टाफ कहीं नहीं मिला। यहां आने पर आज भी लगता है कि अपना ही ऑफिस है। बात आगे बढ़ी तो असहिष्‍णुता को तो आना ही था। उन्‍होंने मेरे फेसबुक पोस्‍ट का जिक्र कर थोड़ी सराहना की। फिर उन्होंने कहा- आमिर खान जैसे लोग तो सब्जी मंडी से कभी खुद सब्जी नहीं खरीदते। फिर उन्हें समाज की हकीकत के बारे में क्या पता। असहिष्णुता की बात हम करें तो समझ में आता है। आमिर तो शो बिजनेस के लिए ऐसा कर रहे हैं।

एक सेलिब्रिटी के लिए कितना आसान है इस नाजुक मसले पर भी बोल देना, फिर अपनी बात वापस ले लेना और फिर भी अपनी बात पर कायम रहने के दावे करना। पर आम लोगों का क्या, जिन्होंने आमिर खान की फिल्म देखने के लिए ‘कयामत से भी कयामत’ की। आमिर जानते हैं कि उनकी एक्टिंग देखने के लिए लोगों का ‘दिल है कि मानता नहीं।’ लोग तो अब भी शिवसैनिकों से जान की ‘बाजी’ लगाकर उनकी एक्टिंग देखेंगे।  लोग उन्हें जमीन के तारे मानते हैं लेकिन आमिर ने तो लोगों को इडियट्स बना दिया। कुल मिलाकर असहिष्णुता कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर ही है। इसके बाहर की दुनिया शानदार है, लाजबाब है। आमिर, आप तो सत्यमेव जयते कहने के लिए भी करोड़ों रुपये ले लेते हैं पर हम तो बिना कुछ लिए उस पर कुर्बान हो सकते हैं। आपका शो का बिजनेस है, शो कीजिए। हमारा दिल मत तोड़िए।

टिप्पणियाँ

  1. aamir khan ka chehra ek brand hai, unki kahi har baat ko prachaar milta hai, dhayan diya jata hai. lekin bhaiya aaj tak unki baat mankar hum ab tak nahi sudhre to ab unki gharwali ki baat nahi sunna pasand karegen. aakhir hum hidustani hai. hum sahishnu hain.

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  2. आमिर ने बहुत प्रचार पा लिया और इतना पा लिया कि उनकी रोजी का सिंहासन डोलने लगा। मिस्टर परफेक्शन उतना ज्यादा बयान देने से नहीं डरे होंगे जितना बयान की प्रतिक्रिया पर डर गये हैं। इसके बाद तो उन्हें बोलना ही था वे देश नहीं छोड़ने जा रहे। कहीं भी जाते तो उन्हें यहां की तरह कौन पूछता। इसलिए अब वह सीने पर हाथ रख कर कह रहे हैं आल इज वेल।

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  3. अब
    जब हम सब "असहिष्णु" घोषित कर ही दिए
    गए हैं तो क्यों न हम असहिष्णुता" का एक उदाहरण प्रस्तुत
    करें ? आगामी 15 दिसम्बर को भारत के
    महानतम "सहिष्णु" कलाकार "शाहरुख" की
    नई फिल्म आने वाली है . क्यों न इस फिल्म
    का "बहिष्कार" कर दिया जाय ? एक
    फिल्म थियेटर में ना देखि तो वैसे भी कुछ
    खो नहीं देंगे हम बल्कि किसी देशद्रोही
    को सबक सिखा देंगे।

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  4. आमिर खान जैसे कलाकार को प्रसिद्धि किसी धर्म या समुदाय से जुड़ने के कारण नहीं बल्कि उनकी अभिनय शैली के कारण मिली है। उनके चाहने वालों ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति को किसी भी मुद्दे पर बयान देने से पहले सौ बार सोचना चाहिए कि इसका समाज के लोगों पर क्या असर पड़ेगा।

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  5. "जब पत्नी असुरक्षित महसूस करे तो उसे पति बदलना चाहिये न कि देश"

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