बिहार में एनडीए की हार क्या दिल्ली के इर्द-गिर्द हुई घटनाओं से तय होगी। एक से एक घटनाएं हो रही हैं जिसमें बेशक एनडीए सरकारों का कोई हाथ नहीं है पर जिम्मेदारी से वे बच नहीं सकते। खास बात यह है कि बिहार में भाजपा दलितों को ही साधने में लगी हुई है। इसी कारण वहां पार्टी ने दो दलित नेताओं राम विलास पासवान और जीतन राम मांझी पर दांव लगाया है लेकिन हरियाणा की घटनाओं से ये दोनों ही नेता बिदक गए हैं। हरियाणा में हुई दलित परिवारों के साथ लगातार हुई दूसरी घटना से भारतीय जनता पार्टी अपनों के निशाने पर आ गई है। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रियों की बयानबाजी ने आग में घी का काम किया है। दूसरी ओर, बिहार में इन्हीं सब घटनाओं और बयानवीरों का बखान कर महागठबंधन अपनी पैठ बनाने में जुट गया है।
जुबान के जले : ऐसे तो नेताओं की बयानबाजी अपने आप में अनोखी मानी जाती है। जानते वे ए के बारे में हैं और बताते जेड के बारे में। ऐसी बयानबाजी से ही नेता बिरादरी एक दूसरे को आगे-पीछे करने में लगी रहती है। एक नेता बयान देने वाला होता है तो दूसरा लपकने वाला। इसी तरह नेता बिरादरी एक-दूसरे की टांग खींचने में लगी रहती है। चुनाव आयोग बिहार चुनाव के तारीखों की की घोषणा करने में जुटा था कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने की बात कह दी। फिर क्या था- डूबने को जैसे तिनके का सहारा मिल गया। महागठबंधन के नेताओं ने इसे हाथोंहाथ लिया और फिर पिल पड़े। समाजशास्त्रियों और चुनावी राजनीति को जाननेवालों का कहना है कि अगर एनडीए बिहार चुनाव हार जाता है तो इसमें मोहन भागवत का बयान मुख्य कारण होगा क्योंकि उन्हीं के बयान के बाद से महागठबंधन को आक्सीजन मिला। नफा नुकसान का आकलन कर भाजपा ने मोहन भागवत के बयान से किनारा तो कर लिया पर लालू प्रसाद यादव जैसे नेता तो जैसे इसी फिराक में थे। मुद्दे को खूब गरमाया और भुनाने की कोशिश की जो एक तरह से सफल होती भी दिख रही है। जुबान पर लगाम न लगा पाने वाले भाजपा नेताओं में बिहार से गिरिराज सिंह पहले नंबर पर आते हैं। लगता तो ऐसे है कि वे पाकिस्तान भेजने वाले टूर एंड ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं।
दादरी का दंश : पिछले माह दादरी में एक ऐसी घटना घटी, जो हमें खुद को कबीलाई कहलाने को विवश करती है। सभ्य समाज में उस तरह की घटना को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। गाय का मांस खाने के आरोप में एक निरीह को उसके घर में घुसकर मार दिया गया। घटना को लेकर कानून व्यवस्था की असफलता पर सवाल उठते, उससे पहले ही भाजपा के बयानवीर वहां पहुंच गए। सबसे पहले वहां के सांसद महेश शर्मा पहुंचे और उसे छोटी घटना बताकर मीडिया से तूल न देने की बात कही। फिर क्या था मीडिया ने उस घटना के साथ ही उनके बयान को भी उतना ही तूल दे दिया। शायद शर्मा साहब यही चाहते थे। फिर तो साध्वी प्राची, साक्षी महाराज आदि नेताओं ने दादरी की घटना को ऐसे प्रोजेक्ट किया, जैसे पाकिस्तान पर फतह मिल गई हो। इस घटना पर प्रधानमंत्री चुप रहे और बाकी सारे मंत्री, सांसद बोलते रहे। प्रधानमंत्री की चुप्पी तब टूटी, जब राष्ट्रपति ने इस घटना की तीखी आलोचना की और सारे समाज को नसीहत दे डाली। इसको लेकर प्रधानमंत्री भी लगातार आलोचना के घेरे में रहे।
हरियाणा की पहली घटना : हरियाणा के फरीदाबाद में दलित परिवार के बच्चों को जिंदा जलाए जाने की घटना से सभी सन्न थे। घटना बड़ी थी और वो भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में घटी थी, लिहाजा सुर्खियों में आने के बाद सरकार आलोचना के घेरे में स्वाभाविक रूप से आ गई। इसके बाद सरकार ने आनन फानन सीबीआई जांच की संस्तुति कर खुद पर हो रहे हमलों की धार को कमजोर करने की कोशिश की लेकिन यहां भी बयानवीरों ने काम बिगाड़ दिया। विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने एक अप्रासंगिक और निम्नतम उदाहरण देकर सरकार का बचाव करने का प्रयास किया लेकिन उनकी छोटी बुद्धि और बड़ी जुबान ने यहां भी सरकार की किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके बयान की तीक्ष्ण आंच बिहार तक पहुंच गई और एनडीए के महादलित चेहरा जीतन राम मांझी ने वीके सिंह को बर्खास्त करने तक की मांग कर डाली। हरियाणा की घटना की रामविलास पासवान पहले ही आलोचना कर वहां की सरकार की असफलता करार दे चुके थे।
हरियाणा की दूसरी घटना : सरकार डैमेज कंट्रोल में जुटी ही थी कि हरियाणा में ही रेवाड़ी जिले में एक अन्य दलित की थाने में पुलिस की पिटाई से मौत हो गई। इसके बाद इस मुद्दे को लेकर मायावती, जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान ने अलग अलग मोर्चा खोल दिया। मायावती ने हरियाणा के मुख्यमंत्री को ही बर्खास्त करने की मांग कर डाली, वहीं जीतनराम मांझी और रामविलास पासवान ने वहां के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पर दलितों की सुरक्षा में कोताही तक का आरोप लगा दिया। अब दबाव में आई वहां की सरकार ताबड़तोड़ मुआवजे की घोषणा कर रही है।
दरअसल दिल्ली चुनाव के समय से ही भाजपा की अजीबोगरीब हालत हो गई है। पार्टी को पता ही नहीं है कि दायां हाथ क्या कर रहा है और बायां हाथ क्या कर रहा है। पार्टी कुछ और कह रही है, आरएसएस कुछ कह रहा है और सरकार का रुख कुछ और है। उसके बाद वाणी पर असंयम से पार्टी का बना बनाया काम बिगड़ता जा रहा है। पहले से ही प्रचारित किया जा रहा है कि चुनाव बिहार का पर असर पूरे देश में। अगर बिहार में एनडीए हारी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तिलिस्म पर सवाल उठेंगे। विपक्ष हमलावर होगा, संसद सत्र और अधिक बाधित होगा। कामकाज नहीं हो पाएगा। सुधार का एजेंडा प्रभावित होगा। राज्यसभा में बहुमत पाने का ख्वाब पूरा नहीं हो सकेगा, जिससे सरकार को काफी कठिनाई होगी। आगे राष्ट्रपति चुनाव तो हइये है।
जुबान के जले : ऐसे तो नेताओं की बयानबाजी अपने आप में अनोखी मानी जाती है। जानते वे ए के बारे में हैं और बताते जेड के बारे में। ऐसी बयानबाजी से ही नेता बिरादरी एक दूसरे को आगे-पीछे करने में लगी रहती है। एक नेता बयान देने वाला होता है तो दूसरा लपकने वाला। इसी तरह नेता बिरादरी एक-दूसरे की टांग खींचने में लगी रहती है। चुनाव आयोग बिहार चुनाव के तारीखों की की घोषणा करने में जुटा था कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने की बात कह दी। फिर क्या था- डूबने को जैसे तिनके का सहारा मिल गया। महागठबंधन के नेताओं ने इसे हाथोंहाथ लिया और फिर पिल पड़े। समाजशास्त्रियों और चुनावी राजनीति को जाननेवालों का कहना है कि अगर एनडीए बिहार चुनाव हार जाता है तो इसमें मोहन भागवत का बयान मुख्य कारण होगा क्योंकि उन्हीं के बयान के बाद से महागठबंधन को आक्सीजन मिला। नफा नुकसान का आकलन कर भाजपा ने मोहन भागवत के बयान से किनारा तो कर लिया पर लालू प्रसाद यादव जैसे नेता तो जैसे इसी फिराक में थे। मुद्दे को खूब गरमाया और भुनाने की कोशिश की जो एक तरह से सफल होती भी दिख रही है। जुबान पर लगाम न लगा पाने वाले भाजपा नेताओं में बिहार से गिरिराज सिंह पहले नंबर पर आते हैं। लगता तो ऐसे है कि वे पाकिस्तान भेजने वाले टूर एंड ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं।
दादरी का दंश : पिछले माह दादरी में एक ऐसी घटना घटी, जो हमें खुद को कबीलाई कहलाने को विवश करती है। सभ्य समाज में उस तरह की घटना को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। गाय का मांस खाने के आरोप में एक निरीह को उसके घर में घुसकर मार दिया गया। घटना को लेकर कानून व्यवस्था की असफलता पर सवाल उठते, उससे पहले ही भाजपा के बयानवीर वहां पहुंच गए। सबसे पहले वहां के सांसद महेश शर्मा पहुंचे और उसे छोटी घटना बताकर मीडिया से तूल न देने की बात कही। फिर क्या था मीडिया ने उस घटना के साथ ही उनके बयान को भी उतना ही तूल दे दिया। शायद शर्मा साहब यही चाहते थे। फिर तो साध्वी प्राची, साक्षी महाराज आदि नेताओं ने दादरी की घटना को ऐसे प्रोजेक्ट किया, जैसे पाकिस्तान पर फतह मिल गई हो। इस घटना पर प्रधानमंत्री चुप रहे और बाकी सारे मंत्री, सांसद बोलते रहे। प्रधानमंत्री की चुप्पी तब टूटी, जब राष्ट्रपति ने इस घटना की तीखी आलोचना की और सारे समाज को नसीहत दे डाली। इसको लेकर प्रधानमंत्री भी लगातार आलोचना के घेरे में रहे।
हरियाणा की पहली घटना : हरियाणा के फरीदाबाद में दलित परिवार के बच्चों को जिंदा जलाए जाने की घटना से सभी सन्न थे। घटना बड़ी थी और वो भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में घटी थी, लिहाजा सुर्खियों में आने के बाद सरकार आलोचना के घेरे में स्वाभाविक रूप से आ गई। इसके बाद सरकार ने आनन फानन सीबीआई जांच की संस्तुति कर खुद पर हो रहे हमलों की धार को कमजोर करने की कोशिश की लेकिन यहां भी बयानवीरों ने काम बिगाड़ दिया। विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने एक अप्रासंगिक और निम्नतम उदाहरण देकर सरकार का बचाव करने का प्रयास किया लेकिन उनकी छोटी बुद्धि और बड़ी जुबान ने यहां भी सरकार की किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके बयान की तीक्ष्ण आंच बिहार तक पहुंच गई और एनडीए के महादलित चेहरा जीतन राम मांझी ने वीके सिंह को बर्खास्त करने तक की मांग कर डाली। हरियाणा की घटना की रामविलास पासवान पहले ही आलोचना कर वहां की सरकार की असफलता करार दे चुके थे।
हरियाणा की दूसरी घटना : सरकार डैमेज कंट्रोल में जुटी ही थी कि हरियाणा में ही रेवाड़ी जिले में एक अन्य दलित की थाने में पुलिस की पिटाई से मौत हो गई। इसके बाद इस मुद्दे को लेकर मायावती, जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान ने अलग अलग मोर्चा खोल दिया। मायावती ने हरियाणा के मुख्यमंत्री को ही बर्खास्त करने की मांग कर डाली, वहीं जीतनराम मांझी और रामविलास पासवान ने वहां के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पर दलितों की सुरक्षा में कोताही तक का आरोप लगा दिया। अब दबाव में आई वहां की सरकार ताबड़तोड़ मुआवजे की घोषणा कर रही है।
दरअसल दिल्ली चुनाव के समय से ही भाजपा की अजीबोगरीब हालत हो गई है। पार्टी को पता ही नहीं है कि दायां हाथ क्या कर रहा है और बायां हाथ क्या कर रहा है। पार्टी कुछ और कह रही है, आरएसएस कुछ कह रहा है और सरकार का रुख कुछ और है। उसके बाद वाणी पर असंयम से पार्टी का बना बनाया काम बिगड़ता जा रहा है। पहले से ही प्रचारित किया जा रहा है कि चुनाव बिहार का पर असर पूरे देश में। अगर बिहार में एनडीए हारी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तिलिस्म पर सवाल उठेंगे। विपक्ष हमलावर होगा, संसद सत्र और अधिक बाधित होगा। कामकाज नहीं हो पाएगा। सुधार का एजेंडा प्रभावित होगा। राज्यसभा में बहुमत पाने का ख्वाब पूरा नहीं हो सकेगा, जिससे सरकार को काफी कठिनाई होगी। आगे राष्ट्रपति चुनाव तो हइये है।
inme ek naam aazam khan ka bhi jod lijiye jo un jaane ko taiyyar hain.
जवाब देंहटाएंकॉमेंट के लिए शुक्रिया
हटाएंविषय प्रासंगिक हैै। समिक्षा में कहीं से भी एकपक्षिय भाव नजर नहीं आने से लेख में समग्रता है। वैसे तो राजनीति का कोई स्तर अब तक पता नहीं चला है लेकिन आपने स्तर तय करने की अच्छी कोशिश की है। एक पुरानी कहावत याद आ रही है कि सफल वहीं होता है, जिसकी नजरें अपने चुल्हे तक होती है। शायद यहां पर राजा चुक रहे हैं और वजीर बेलगाम होकर खेल बिगाड़ने में लगे हैं। आपको एक बार फिर से धन्यवाद एक अच्छी बौद्धिक खुराक के लिए।
जवाब देंहटाएंअरविंद ओझा
धन्यवाद
हटाएंyeh to sahi hain ki cow ka mudda nahi hona chiye. kyoun ki janwar ko hatiyar nahi banana chiye. modi ke ander jadu to hain kyounki vah kahte hani achche din aye ge.
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
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जवाब देंहटाएंएकदम सही आंकलन किया है सर जी। ईश्वर सद्बुद्धि दे इन वरिष्ठ और वृद्ध नेताओं को
बहुत अच्छे
जवाब देंहटाएंसही मारा है.. गजब लिखा है
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंAchha he sarji. Maja aega likhte rahiye.... Ye modiji fir ghumne ja rhe he. Suna he bihar election k bad 30 din me 60,000 km ki yatra karenge...!!!
जवाब देंहटाएंकॉमेंट के लिए शुक्रिया
हटाएंनेता मायने कुत्ते की पूंछ, जो कभी सीधी नहीं हो सकती। जिस तरह अंग्रेज आपस में लड़ाओ और राज करो की नीति अपनाते थे। उसे अब देश के नेताओं ने अपना लिया है। उसका चोला बदल गया है। उदेश्य वही लड़ाना और राज करना है। जनता को जाति और धर्म में बांटकर नेता अपनी ही तिजोरी भर रहे हैं और जनता हर चुनाव में उन्हीं मदारी नेताओं के बहकावे में आकर फिर उन्हें ही जिता देती है। वरना क्या कारण है कि बिहार का व्यक्ति इतना मेधावी होते हुए भी वहां नौकरी नहीं पा रहा है वह नौकरी के लिए यूपी पंजाब और दिल्ली में बसा है।
जवाब देंहटाएंकॉमेंट के लिए शुक्रिया
हटाएंbahut achha....
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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