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संदेश

#EVM! हम शर्मिंदा हैं

हां, हम शर्मिंदा हैं। हों भी क्यों न। साफ-सुथरा कई मतदान कराने के बाद भी तुम्हारे दामन पर इतने दाग जो लगाए जा रहे हैं। 1998 के बाद से अब तक तुमने चुनाव को निष्पक्ष और बेदाग बनाने के लिए जो अतुलनीय योगदान दिया, उसे हम भुला बैठे और स्वार्थ की खातिर तुम्हारी उपयोगिता पर ही सवाल उठा दिया। तुम्हारे कारण चुनाव आयोग को विदेशों यहां तक कि अमेरिका जैसे हाइटेक देश में प्रसिद्धि मिली और हमारे चुनाव आयुक्त गाहे-बगाहे वहां सम्मानित होते रहे। कैसे भूल सकते हैं तुम्हारे योगदान को। बूथ कैप्चरिंग को तुमने खत्म ही कर दिया। अब चुनाव में धांधली बीते जमाने की बात हो गई है। तुमने क्या नहीं किया। जो आज तुम पर उंगली उठा रहे हैं, उन्हें भी कभी तुम्हारे कारण सत्ता का स्वाद हासिल हो सका, वो भी अपने बलबूते। 2004, 2009 के आम चुनाव, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव, दिल्ली और बिहार में विधानसभा चुनाव के बाद उन्हीं लोगों को सत्ता मिली थी, जो आज तुम पर कीचड़ उछाल रहे हैं पर आज जब उन्हें करारी हार मिली है तो तुम पर लांछन लगा रहे हैं। तुम्हारे चरित्र पर घटिया इल्जाम लगा रहे हैं। तुम्ही पर क्यों ये तो पूरी जनमानस ...

चुनाव कोई वसंत ऋतु नहीं कि आमूलचूल बदलाव कर दे

आमूलचूल बदलाव के मौसम वसंत ऋतु उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में एक और बदलाव की गवाह बन सकती है। वसंत के साथ-साथ यह चुनावी मौसम भी है। इस समय नेता जनता के दर पर हैं। रैलियां चरम पर हैं। हेलीकॉप्टर धूल का गुबार उड़ाते उतर रहे हैं और कुछ ही मिनटों में नेताओं की बकैती के बाद फिर आसमानी सैर पर निकल पड़ते हैं। जिन नेताओं को आम दिनों में जिला मुख्यालयों या शहरों में आने की फुरसत नहीं मिलती, वे इस समय गांवों तक की खाक छान रहे हैं। कई ऐसे तहसील और कस्बे होंगे, जहां मुख्यमंत्री तो छोडि़ए मंत्री तक ना गए होंगे, वहां इस समय एक उड़नखटोला उड़ रहा है तो दूसरा उतर रहा है। जनता इस समय जनार्दन है और नेतारूपी भक्त मन में एवमस्तु का वरदान पाने की लालसा में खाक छान रहे हैं। तरह-तरह के जुमले वादे का रूप लेकर सामने आ रहे हैं। पांच साला इस जलसे में उलट बयार सदा से बहती चली आ रही है। एक से एक वीआईपी गाड़ियां गांवों का रुख कर रही हैं। कम-अधिक विकास के छोटे-बड़े दावों को छोड़ दें तो मतदाताओं को प्रमोशन सिर्फ इस रूप में हुआ कि वे बैलेट पेपर पर ठप्पा लगाने के बदले ईवीएम पर बटन दबाने लगे। इसके अलावा एक और...

दक्षिण और हम

कितना अंतर है, तमिलनाडु में अम्‍मा की हालत बिगड़ने मात्र की सूचना से वहां मातम पसर गया है। लोग छाती पीट रहे हैं, भगवान से गुहार लगा रहे हैं, जो हो सकता है वो कर रहे हैं इसलिए कि अम्‍मा बच जाएं। वो सही सलामत अपोलो से बाहर निकलें और सीएम आवास में पूर्व की तरह विराजमान हों। दूसरी तरफ देश में ही तमिलनाडु से इतर एक दुनिया है, जो स्‍मार्टफोन और कंप्‍यूटरों के स्‍क्रीन पर अम्‍मा के निधन की सूचना टाइप कर चुका है और इंतजार कर रहा है कि वो मरें और हम पूरी दुनिया को सबसे पहले यह खबर बताएं। हममें से कई तो ऐसे हैं, जिन्‍होंने अम्‍मा के मरने का भी इंतजार नहीं किया और सोशल मीडिया पर अम्‍मा की स्‍मृति शेष की याद दिला दी। कइयों ने लिखा - अनंत सफर पर निकलीं अम्‍मा। कुछ ने पुरानी फोटो के साथ कुछ ऐसा लिखा कि लगा कि सचमुच अम्‍मा हमें छोड़कर चली गईं। सोमवार को दिन चढ़ने के साथ सोशल मीडिया पर स्थिति स्‍पष्‍ट होती गई लेकिन शाम को फिर वहीं कौतूहल, आतुरता और एक न दिखने वाली लाइन से आगे जाने की सोच, जिस पर अफसोस के अलावा कुछ किया ही नहीं जा सकता। जरा सोचिए, तमिलनाडुु में अम्‍मा की हालत खराब होने मात्र की...

संडास के लिए भी लाइन में लगते देखा है

आजकल देश में लाइन में लगने को लेकर बहस छिड़ी हुई है। दूसरी ओर, हमलोग तो संडास के लिए भी लाइन में लगने के तजुर्बेकार हैं। कब हम लाइन में नहीं लगे। जब से होश संभाला, तब से लाइन में खड़े लोगों को देखते रहे हैं। केरोसिन और चीनी के लिए लोग हर महीने लाइन में खड़े रहते हैं। सिनेमाहॉल की टिकट खिड़की पर ऐसा कौन होगा, जो अपना हाथ न छिलवाया होगा। रसोई गैस सिलेंडर के लिए किलोमीटर तक की लाइन भी हमने देखी है। सर्कस और मौत का कुआं की टिकट के लिए लाइन में लगे हैं हम। रेलवे रिजर्वेशन काउंटर और रोडवेज की टिकट खिड़की पर भी धक्‍का खाए हैं हमने। बैंक में पैसा जमा करते और निकालने के लिए भी सैकड़ों लोगों को लाइन में लगते देखा है। कोर्ट में पेशी के लिए भी लाइन होती है और आपके हमारे केसों की सुनवाई के लिए भी एक लाइन होती है। वोट देने के लिए सुबह से लगी लाइन शाम के निर्धारित समय तक भी खत्‍म नहीं होती। स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र पर टीका लगवाने के लिए भी लाइन से होकर ही जाना होता है। परीक्षा फॉर्म भरने के लिए भी लाइन लगने की जरूरत होती है। डाक घर में पोस्‍टल ऑर्डर और बैंकों में डिमांड ड्राफ़ट के लिए भी लाइन ...

तुम मुझे #Vote दो, मैं तुम्‍हें मोबाइल दूंगा

शीर्षक का राग तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दिया था। यहां चुनावी राजनीति के लिहाज से शब्‍दों का हेरफेर किया गया है। शायद नेताजी आज के समय में चुनाव लड़ रहे होते तो उन्‍हें भी इसी तरह का लोकलुभाव नारा देना पड़ता। चलिए नेताजी नहीं हैं लेकिन एक दूसरे नेताजी के सुपुत्र और उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री ने यह नारा देकर युवाओं में खास संदेश देने की कोशिश तो की ही है। चुनावी राजनीति में लेनदेन के वादे का यह खेल कांग्रेस ने शुरू किया था। आजादी के बाद से कांग्रेस उत्‍तरोत्‍तर अपनी सत्‍ता गंवाती रही और एक से  एक लोकलुभावन नारे देती रही लेकिन वादों पर अमल दूसरी पार्टिंयों के भरोसे छोड़ती गईं। इसी कारण नए-नए छोटे-छोटे राजनीतिक समूह उभरे और बाद में मजबूत होते गए। एक तरह से देखा जाए तो कांग्रेस के वादे सैद़धांतिक ही रह गए, जबकि बाद में उभरीं पार्टियां इस मामले में भौतिकवादी साबित हुईं। 70 के दशक से कांग्रेस लगातार अपनी जमीन खोती गई और क्षेत्रीय क्षत्रप उसे हथियाते गए। इस गंवाने और हथियाने के पीछे के कारणों पर प्रकाश डालें तो एक बड़ा कारण वादों का सैद़धांतिक और भौतिक होना भी है। कांग्रेस ने कभ...

गाली, कबाली और मदारी

गाली, कबाली और मदारी। इत्‍तेफाक है कि ये तीनों एक साथ दृश्‍य हो रहे हैं। गाली का तो इतिहास पुराना है पर इस बार की गाली थोड़ी अलग है। गालियां पहले भी दी जाती रही हैं, अफसोस पहले भी जताई जाती रही है और माफी पहले भी मांगी जाती रही है पर इस बार की गाली चुनाव की चौखट पर दी गई है। इसलिए यह खास हो जाती है। यह गाली कुलीन वर्ग से निकलकर दलित वर्ग को निशाना बना गई है। प्रत्‍युत्‍तर में दलित वर्ग से निकली गाली कुलीन वर्ग को छलनी कर गई है। प्रख्‍यात विचारक हीगल ने द्वंद्वात्‍मक भौतिकवाद का सिद़धांत दिया था पर इस बार की गाली द्वंद्वात्‍मक समाजवाद का संदेश दे गई है। देखना होगा कि दोनों तरफ से निकली गालियां क्‍या गुल खिलाती हैं। ध्‍यान रहे, इसे गोली समझने की भूल न करें। गाली के बीच कबाली आ गई। करोड़ों दर्शक रजनीकांत के इस मूवी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। दर्शकों ने खूब सराहा। फिल्‍म में मलेशियाई लोकेशन की शूटिंग ने लोगों का मन मोह लिया। इसके अलावा रजनीकांत का स्‍टाइल दर्शकों को खूब भाया। इस बीच खबर आई कि फिल्‍म ऑनलाइन लीक हो गई है। इससे निर्माता और निर्देशक को करारा झटका लगा। हालांकि यह द...

कह दो कि ब्राह़मणों को मुआवजा नहीं देंगे

जून के महीने में सड़ी हुई गर्मी के बीच राजनितिक हलकों में भी कुछ ऐसा हुआ, जिससे सड़ांध और बढ़ गई। अगले साल होने वाले चुनाव में अगर सपा सरकार चली जाती है तो इसमें इस जून महीने की इस सड़ांध का भारी योगदान होगा। दरअसल जून के पहले हफ्ते में ये रिपोर्ट आई कि बिसााहड़ा में अख़लाक़ के घर में जो मीट रखा था, वो गाय का ही था। इसके एक दो दिन बाद ही मथुरा बवाल में यूपी पुलिस ने तेजतर्रार एसपी मुकुल द्विवेदी समेत एसओ फरह को खो दिया। सकते में आई सरकार ने दोनों के परिजनों को 20-20 लाख रूपये मुआवज़ा देने की घोषणा कर दी। यही घोषणा और जल्दबाजी सरकार के गले की फांस बन गई। दरअसल बिसाहड़ा कांड में अखिलेश सरकार ने तुष्टिकरण की नीति अपनाते हुए 45 लाख रुपये और नॉएडा में 3 फ्लैट मुफ़्त देने की घोषणा की थी। अब मथुरा कांड में अखिलेश सरकार ने जैसे ही 20-20 लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की, भाजपा को बैठे बिठाये बड़ा और उसके मन के मुफीद मुद्दा मिल गया। अख़लाक़ के घर में गाय का मांस होने की पुष्टि होने पर पहले से तैयार बैठी भाजपा ने सरकार के मुआवजा देने के तरीके पर ही सवाल उठा दिया। मुकुल द्विवेदी से पहले दरोगा मनोज मिश...