पठानकोट की दहशत, मालदा में उत्पात और पूर्णिया में उपद्रव के बाद क्या? दहशत का यह ‘कारवां’ क्या ऐसे ही थम जाएगा, कदापि नहीं। दहशत की दुकान ऐसे बंद नहीं होती। कुछ और शहर तय कर लिए गए होंगे। लिस्ट बहुत लंबी है। यह अलग बात है कि घटना होने के बाद ही हमें और आपको पता चलेगा। किस शहर का नाम आगे है और किसका पीछे, यह शहर के दुर्भाग्य पर निर्भर करता है। मन अशांत है, लोग शांत हैं। एके हंगल साहब होते तो पूछते- इतना सन्नाटा क्यों पसरा है भाई? अब वे नहीं हैं तो चलो मैं ही पूछ लेता हूं। कैसी विचाराग्नि है? घटना को चुन-चुनकर धधकती है। सोशल साइट पर पक्ष और विपक्ष है। तीसरा पक्ष गायब है। अजीब तरह का माहौल हो गया है। पठानकोट के समय मुंबई हमले की छुई-अनछुई बातों को बेपर्दा किया जा रहा है। मालदा की तुलना दादरी की घटना से हो रही है। फोटोशॉप का खूब प्रयोग हो रहा है और एकदम से विश्वास किया जाने वाला झूठ पैदा किया जा रहा है। आप समझ रहे हैं कि यह सतही और उच्छृंखल लोग ही कर रहे हैं लेकिन आप गलत हैं। बड़े लोग खासकर उच्च पदों पर आसीन वर्ग के लोग ऐसा कर रहे हैं। बड़े-बड़े पत्रकार इस पेशे में लग गए हैं। ऐसा सिर्फ एक...