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संदेश

नववर्ष मंगलमय हो

नववर्ष मंगलमय हो नूतन हो, सृजन हो नवीन सोच हो, दर्शन हो सारी धरती और सारा आकाश हो नववर्ष मंगलमय हो जीवन में बहार हो जिंदगी लाजबाब हो उमंग हो, उत्साह हो सबका प्यार हो नववर्ष मंगलमय हो सबका प्यार मिले सबका दुलार मिले सब तुझे चाहें, तू सबको चाहे दुश्मन भी दोस्त हो जाए ऐसा तुझे संसार मिले नववर्ष मंगलमय हो वेदना नहीं, संवेदना हो दर्द नहीं, आनंद हो तड़प नहीं, प्रणय हो बिछुड़न नहीं, साथ मिले नववर्ष मंगलमय हो विछोह नहीं, संसर्ग हो त्याग हो, अर्पण हो तेरा तुझको मिले मेरा मुझको मिले नववर्ष मंगलमय हो गुरु आपको ज्ञान दें मित्र भी आपको सम्मान दें बच्चों को स्नेह मिले बड़ों का आशीष मिले नववर्ष मंगलमय हो मां लक्ष्मी आपको दौलत दे मां सरस्वती दे दे विद्या गणपति आपको बुद्धि दें मां दुर्गा बनाएं बलवती हर सुख से खुशहाल रहें नववर्ष मंगलमय हो सारी धरती और सारा आकाश हो नववर्ष मंगलमय हो

सड़ गई है प्रयोगशाला की 'परखनली'

बिहार मतलब राजनीति की प्रयोगशाला। आज़ादी के बाद से अमूमन राजनीति के सभी प्रयोग बिहार में ही हुए हैं। इन प्रयोगों से जो निष्कर्ष निकला, उससे देश का तो कही न कही भला हो गया पर निरंतर प्रयोगों से प्रयोगशाला रूपी बिहार की 'परखनली' सड़ गयी प्रतीत होती है। बिहार उस कम्पास की तरह हो गया, जो दूसरों को दिशा दिखाते दिखाते खुद दिशाहीन हो गया। प्रयोगकर्ताओं ने बिहार के लोगों के मन में ये सफलतापूर्वक भर दिया कि तुम बिहार के हो तो तुर्रम खान हो। ऐसा इसलिए किया गया ताकि लोग दम्भ में चूर हो जाएँ। क्योंकि दम्भ में चूर व्यक्ति किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता। वो खुद को दाता समझने लगता है। राजनेताओं के लिए प्रयोग दर प्रयोग यह आसान होता गया। बिहार के लोगों ने कभी नेताओं के आगे अपनी झोली नहीं फैलाई और आवश्यकता से अधिक स्वाभिमान के बोझ तले दबे रहे और राजनेता मौज करते रहे। अमूमन बिहार के लोगों को राजनितिक दृष्टि से अधिक संवेदनशील माना जाता है। यह भी लोगों को दम्भित करने का सिला है, जो बहुत ही सोच समझकर किया गया। नहीं तो इसके पीछे का कोई वैज्ञानिक या भौगोलिक कारण उपलब्ध नहीं है। दरअसल बिहार के लोगों को ...

मन की बात!

मित्रों, मन की बात यह है कि मन बड़ा परेशान है। मैं मन की बात करता गया और आपलोग अनसुना करते गए। दिल्ली और बिहार मेरे हाथ से निकल गया। विरोधियों के साथ साथ अपनों की उँगलियाँ भी उठने लगी हैं। वे उँगलियाँ भी उठने लगी हैं, जो रोटी भी नहीं उठा पातीं। इसलिए व्यथित हूँ। अब आप लोग ही मेरा साथ नहीं देंगे तो कौन देगा? मित्रों, इस बार मन की बात को गौर से सुनिएगा। मैं रूस में था। वहां से काबुल होते हुए मुझे दिल्ली आना था। दिल्ली में वाजपेयी जी को जन्मदिन की बधाई देनी थी। काबुल में वहां की संसद को संबोधित करते हुए मैंने आतंकवाद पर इशारों में पकिस्तान को जमकर कोसा। फिर अचानक पाकिस्तान जाने का निर्णय ले लिया। संयोग से उसी दिन नवाज का जन्मदिन भी था। मई समझ सकता हूँ कि मेरे इस फैसले को लेकर क्या प्रतिक्रिया हुई होगी। क्या देश, क्या विदेश सभी हतप्रभ थे पर आपलोग तो जानते ही हैं कि इसी तरह मैंने बराक, शी और आबे को सरप्राइज़ दिया था। यह आज की विदेश नीति की मांग है। इसके परिणाम क्या होंगे, इसमें मैं नहीं जा रहा पर अटल जी की पहल को आगे बढ़ाते हुए मैंने उन्हें जन्मदिन का तोहफा देने की कोशिश की है। मित्र...

गुम होते जवाब

सवाल हावी हो रहे हैं और जवाब गुम। सवाल के जवाब में नए सवाल हैंपर जवाब नहीं है। छोटे सवाल के जवाब में बड़ा सवाल है। प्रश्नोत्तर की विधा प्रश्न और प्रश्न के खेल में दफन होती जा रही है। अब यह प्रश्न बड़ा हो चला है कि मेरा प्रश्न बड़ा है कि तुम्हारा। जवाब के कोई मायने नहीं हैं और जवाब कोई चाह भी नहीं रहा है।  ये कोई एक आदमी कर रहा है, एक संस्था कर रही है या फिर सरकार कर रही है, यह कहना गलत होगा। यह हम सब मिलकर कर रहे हैं। जो यह नहीं कर रहा है, हम उसका उपहास उड़ा रहे हैं, वैचारिक रूप से उस पर हमला बोल रहे हैं।  हम आपस में एक दूसरे की आवाज को दबाना चाहते हैं और अपनी आवाज को भी धार नहीं दे पा रहे हैं। घोटाले का जवाब घोटाला है। मेरा घोटाला छोटा और तुम्हारा घोटाला बड़ा। मेरे राज्य में क्राइम कम और तुम्हारे राज्य में ज्यादा। मेरा राज्य अच्छा और तुम्हारा राज्य बुरा। मेरा अपराध छोटा और तुम्हारा अपराध फांसी पर चढ़ने लायक। बहस का दायरा इसी मेरे और तेरे में सिमटता जा रहा है। अखबार, टीवी और सोशल मीडिया के डिबेट में इसे लगातार बल मिल रहा है। तर्क गायब होता जा रहा है। जब सवाल नहीं होंगे तो तर्क...

मोदी से ताकतवर हैं जेटली

वाकई बहुत नाइंसाफी है रे। दुस्साहस दिखाने के चलते भाजपा ने कीर्ति को तो आजाद कर दिया लेकिन शत्रु को ‘खामोश’ करने का कोई नुस्खा अभी पार्टी के पास नहीं दिखता। कीर्ति के तल्ख तेवर तो हफ्ते भर से टीवी की टीआरपी बढ़ा रहे हैं, वहीं शत्रु पिछले कई महीनों से अपना गुबार निकालकर मोदी लहर के गुब्बारे में सूई घोंप रहे हैं। कीर्ति के साथ-साथ राजनीति को जानने समझने वाले भी पार्टी के इस कदम से भौंचक हैं। जब पार्टी कीर्ति आजाद पर कार्रवाई कर सकती है तो शत्रुघ्न सिन्हा, आरके सिंह, भोला सिंह आदि नेताओं पर क्यों नहीं? इन नेताओं ने तो सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती दे दी थी। फिर भी इन पर रहमोकरम समझ से परे है। तो क्या यह मान लिया जाए कि भाजपा में नरेंद्र मोदी पर हमला करना आसान है और अरुण जेटली को निशाना बनाना मुश्किल। अभी तक पत्रकार लोग कलम इस मुद्दे पर तोड़ रहे थे कि नरेंद्र मोदी काफी शक्तिशाली प्रधानमंत्री हैं। कोई इसके खिलाफ लिख रहा था तो कोई इसके समर्थन में था लेकिन सरकार द्वारा उठाए गए पिछले कुछ कदमों को देखें तो प्रतीत होता है कि अरुण जेटली पार्टी और सरकार के लिए मास्टरमाइंड के रू...

मैं निर्भया हूं

मैं निर्भया हूं। आपकी अपनी निर्भया। सर्द रातों में वहशी दरिंदों की शिकार निर्भया। वहशीपन भी ऐसा कि क्या कहूं। खैर, मैं दुनिया से रुखसत हो गई लेकिन फिर भी आप सबके बीच हूं। दिखावे के लिए ही सही, ‘16 दिसंबर’ अब सिर्फ एक फिल्म का नाम नहीं रहा। अब यह मेरे और मेरे जैसे कितनी पीड़िताओं के साथ हुए पाप का प्रायश्चित करने का एक दिन बन गया है। आप सब कितने अपनेपन से इस दिन मुझे याद करते हैं। इसी बहाने लड़कियों की सुरक्षा के नए-नए संकल्प लेते हैं। मुझे खुशी है कि मैं हजारों-लाखों लड़कियों की सुरक्षा के उपाय करने का जरिया बन गई हूं। मैं समझती हूं कि मेरा जीवन सफल हो गया। मेरी कुर्बानी जाया नहीं गई और कुछ अच्छे कामों को पूरा करने का बहाना बन गई है। जैसा कि आप सब जानते हैं, मेरे साथ वहशीपन करने वाले दरिंदों में से तब एक नाबालिग भी था। मेरे साथ हुए पाप में वह बराबर का साझीदार था। आजकल वह  चर्चाओं में है। टीवी, सोशल मीडिया और अखबारों में अभी एक बहस चल पड़ी है। उसे छोड़ा जाना चाहिए कि नहीं। उसने जो पाप किया था, उसकी सजा तो अधिक है पर नाबालिग होने के कारण उसे सजा कम हुई और वह बाहर निकल रहा...

ये जो रावण है.....

सीता हरण ब्रह़मांड का सबसे पहला हाईटेक अपहरण कांड था। एक स्‍त्री के अपहरण के लिए उस समय के तीव्रतम पुष्‍पक विमान का प्रयोग किया गया था। आज अपहरण कितना सस्‍ता और आसान हो गया है। राह चलते आदमी को गन्‍ने के खेत में खींच लो और मीलों पैदल टहलाओ। बाइक पर बैठाकर ले जाओ। वैन से अपहरण काफी चलन में है लेकिन इस रावण ने तो अपहरण को और भी सरल करके दिखा दिया। रिक्‍शे से अपहरण, सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लग रहा है पर इसका अपना अलग प्रतीकात्‍मक महत्‍व है। वो लंकेश था, लंकाधीश था, कुबेर का भाई था। दूसरी ओर यह सिर्फ और सिर्फ रावण है। यह रावण शानो-शौकत में भरोसा नहीं रखता। वैभव के नाम पर इस रावण के पास पहनावा-पोशाक के साथ रिक्‍शा और उसका चालक है लेकिन इसकी सोच जमीनी है। लंकापति रावण ने रंजिश में सीता का अपहरण किया था। उस दौरान वह दंभ में चूर था पर इस रावण के चेहरे पर दंभ नहीं है। पुष्‍पक विमान पर रावण और सीता के अलावा और कोई नहीं था पर इस रिक्‍शे पर रावण और सीता के अलावा रिक्‍शाचालक है। रिक्‍शाचालक अपना काम तल्‍लीनता से कर रहा है। रावण के चेहरे पर अपना एक भाव है पर सीता इसमें वाकई अबला नारी बन बैठी है...