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संदेश

रफ्तार भी कोई चीज है

रफ्तार के बाजार में हमने कितनी लेट एंट्री मारी है? ऐसे लग रहा है जैसे आधा से अधिक सिलेबस खत्म होने के बाद किसी छात्र ने क्लास में एडमिशन लिया है। हम खुद को 21वीं सदी का देश मान रहे हैं, पूरे विश्व का नेतृत्व करने का दंभ भर रहे हैं। अमेरिका, चीन और जापान को पीछे छोड़ने की बात कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन के सामने खड़े होने को बेकरार हैं लेकिन.....। यह लेकिन बहुत बड़ा लेकिन है। क्या हम अमेरिका और बाकी देशों के बराबर खड़े भी हो पाए हैं। क्या विश्व हमें अपना नेता केवल इसलिए मान ले कि हमारे यहां कभी कोहिनूर था और हमारे देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। या केवल इस बात के लिए विश्व हमें नमन करे कि यहां कभी नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय होते थे। क्या हम इसलिए सरदार हो गए हैं कि हमारे पास विश्व की दूसरी सबसे अधिक जनसंख्या है। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो गलत हैं। हम ऐसा तभी कर पाएंगे जब हम उनकी बराबरी करेंगे, विकास करेंगे। हमारा रहन-सहन भी विश्वस्तरीय होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हम नाहक मूंगेरीलाल के हसीन सपने देखते रहेंगे। ...

मुसलमान बुद्धिजीवी ही मुस्लिमों के सबसे बड़े दुश्मन

ये बात हम क्यों कह रहे हैं? इसको समझना होगा। किसी भी मुस्लिम बुद्धिजीवी से बात करो तो वो कौम की बात पहले करता है, समाज या व्यक्ति विशेष की बात बाद में। मुस्लिमों में यह बात भर दी गयी है कि कौम की तरक्की में ही उनकी तरक्की है। कोई मुस्लिम बुद्धिजीवी यह बात कहने का साहस नहीं करता कि व्यक्ति की तरक्की में समाज की तरक्की है और समाज की तरक्की में देश की तरक्की है। कौम की तरक्की की बात करने से चंद कठमुल्ले फायदा उठा ले जाते हैं और आम मुसलमान इसी बात से खुश हो जाता है कि उसके कौम की तरक्की की बात हो रही है। उसे तनिक भी भान नहीं होता कि वह ठग लिया गया। टीवी पर भी मुसलमानों के मसाइल पर किसी प्रोफेसर या समाजशास्त्री को चर्चा के लिए नहीं बुलाया जाता। वहां पर भी कठमुल्लों का सिक्का चलता है। मुसलमानों से बाहर की दुनिया भी मानकर चलती है कि कठमुल्ले ही मुस्लिम मसाइल पर बेहतर चर्चा कर सकते हैं। जाहिर है कोई विद्वान वो बात नहीं कर पायेगा जो कठमुल्ला कर सकता है और धर्म के नाम पर बरगला सकता है। इसी कारण सीरिया, यमन, फलिस्तीन आदि देशों में हुई घटनाएं अपने यहाँ स्वाभाविक रूप से सुर्खियां बन जाती है...

....क्योंकि हम देश के लिए खाते हैं

हम कांग्रेस के लोग कांग्रेस को सत्यनिष्ठा से बिना किसी लाग-लपेट और स्वार्थ के संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न और कानून से ऊपर, गांधी परिवार की बपौती पार्टी मानते हैं और श्रीमती सोनिया गांधी को न सिर्फ पार्टी बल्कि देश की राजमाता और श्रीमान राहुल गांधी को युवराज घोषित करते हैं तथा यह भी तय करते हैं कि इन दोनों पर किसी तरह की क़ानूनी कार्यवाई होने पर हम देश भर विरोध प्रदर्शन करेंगे और संसद की कार्यवाही को बाधित कर देंगे, क्योंकि हम इनदोनो को कानून से ऊपर मानते हैं। हम एतद् द्वारा इस प्रस्तावना को अंगीकृत, अधिष्ठापित और आत्मार्पित करते हैं। हम कांग्रेस के लोग सर्वसम्मति से इसी प्रस्तावना को मूल आधार मानते हैं। यह प्रस्तावना पार्टी को एक सूत्र में बांधती है। हमारी पार्टी में राजमाता या युवराज के खिलाफ बोलना राजनितिक आत्महत्या माना जाता है। विडम्बना की बात है कि देश की सबसे पुराणी पार्टी और स्वाधीनता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका होने पर भी आज कांग्रेस के बारे में उल्टा सीधा कहा जा रहा है। आजादी की खुमारी इतनी जल्दी उतार जायेगी ये तो हम कांग्रेसियों ने सोचा ही नहीं था। मजाक था क्या एओ ह्यूम की प...

संविधान आपकी बपौती नहीं खड़गे साहब

‘संविधान में बदलाव किया गया तो देश में रक्तपात मचा देंगे।’ यही शब्द थे न लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का। खुद कांग्रेस पार्टी एक तिहाई से अधिक संविधान बदल चुकी है और जब खुद सत्त्ता से बाहर है तो इस तरह की चुनौती दे रही है। शायद कांग्रेस पार्टी यह मानती है कि संविधान पर सिर्फ और सिर्फ उसी का हक है और सिर्फ कांग्रेस पार्टी को ही संविधान में बदलाव का विशेषाधिकार है। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि लागू होने के डेढ़ साल के भीतर ही 18 जून 1951 को पहला संविधान संशोधन किया गया। इसके दो साल बाद 01 मई 1953 को दूसरा संशोधन आया। आलम ये था कि इमरजेंसी से पहले तक कांग्रेस की सरकार संविधान में 35 संशोधन कर चुकी थी। इतना संशोधन तो सवा दो सौ साल पुराने अमेरिकी संविधान में अब तक नहीं हुए। अमेरिका के संविधान में अब तक मात्र 27 संशोधन ही हो पाए हैं। वहीं 1958 के बाद से अब तक फांस के संविधान में मात्र 22 संशोधन हुए हैं। स्विटजरलैंड का आंकड़ा तो दहाई से भी कम है। 1906 के बाद से अब तक वहां के संविधान में मात्र आठ संशोधन हो पाए हैं। बांग्लादेश के संविधान की उम्र हालांकि अपने देश के संविधान...

आपका शो का बिजनेस है, शो कीजिए, हमारा दिल मत तोड़िए

आधी रात तक उधेड़बुन में था। सोच रहा था कि महीने दिन पहले जो शब्द लोग बोल नहीं पाते थे वो अचानक आम बोलचाल की भाषा कैसे हो गई? कैसे उसे लेकर ट्वीट पर ट्वीट किया जा रहा है। फेसबुक पर पक्ष और विपक्ष में पोस्टों की अचानक बाढ़ आ गई है। इस पर बहस करते लोग अपना-पराया, भाई-भाई, गुरु शिष्य परंपरा को भी भूल जा रहे हैं। एक तरह का साइबर वार चल रहा है। टीवी की बहस जिस शब्द के बिना पूरी नहीं हो रही है उस शब्‍द का नाम है असहिष्णुता। वाकई बहुत ही असहिष्णु शब्द है ये। सुबह इसी शब्द के साथ नींद टूटी। हाथ मोबाइल को टटोलने लगा। सोचा कि इस विषय पर कुछ न कुछ नए पोस्ट या ट्वीट आए होंगे या रात के पोस्ट पर नए रिएक्शन आए होंगे। नोटिफिकेशन की लंबी लाइन लगी थी। एक एक कर देखने लगा। हर एक टवीट और हर एक पोस्ट पर तत्काल मन में रिएक्शन उभरते चले गए। आसपास का माहौल तो सहिष्णु था। बीवी चाय लेकर सामने थी और बच्चे अठखेलियां कर रहे थे। छोटी बेटी जय जय बजरंग बली वाला गाना गा रही थी। साथ ही बजरंगी भाईजान में मुन्नी के कैरेक्टर की मिमिक्री कर रही थी पर मेरा पूरा ध्यान मोबाइल पर टिका था। पत्नी के साथ चाय की चुस्की ली। रोज की...

बेचारा आमिर खान

हमें नाज है आमिर खान पर। कितना रिस्क लेकर इंडिया में रह रहा है बेचारा। ऊपर से पत्नी की बात भी नहीं मानी। ये तो डबल रिस्क हो गया। इतना बड़ा स्टार और इतना बड़ा रिस्क। बेचारा क्या करे। पत्नी की मानेगा तो हीरोपंथी ख़त्म हो जायेगी। नहीं मानेगा तो गृहस्थी ख़त्म। अब आप ही बताओ पत्नी की बात मानकर सीरिया, नाइजीरिया, अरब, इराक, ईरान, पाकिस्तान, तुर्की आदि देशों में जाकर क्या करेगा। फ्रांस पर हमले के बाद यूरोप में जो सहिष्णुता बढ़ी है उसके कारण यूरोप नहीं जा सकते। अमेरिका और कनाडा में तो इतनी  सहिष्णुता है कि वहां अक्सर खान बंधुओं को नंगे होकर स्कैनर से गुजरना पड़ता है। पत्नियां यही तो मौलिक और व्यवहारिक ज्ञान नहीं समझ पातीं। एक तो ऐसे ही इतना बड़ा रिस्क लेकर आदमी चल रहा है ऊपर से देश छोड़ने का टेंशन। राय देना बड़ा आसान है और उस पर अमल करना उतना ही मुश्किल। बेचारे की सभी पिक्चर इस समय 500 करोड़ के क्लब में शामिल होती चली जा रही हैं और किरण है कि देश छोड़ने की बात कर रही है। पत्नी को इतना भी जुल्म नहीं करना चाहिए। हीरो है वो देश का। एक ढेला भी उस पर गिरा तो देश में असहिष्णुता फ़ैल जायेगी। और एक भ...

भाजपा का ‘विचित्र किन्तु सत्य’

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा के बारे में टिप्पणी की थी : विचित्र किन्तु सत्य। उस समय तो वह टिप्पणी राजनीतिक थी और उसे राजनीतिक दृष्टि से ही देखा गया था पर बदले हालात में यह टिप्पणी कम से कम भाजपा के बारे में सत्य साबित हो रही है। भाजपा के लिए पहला विचित्र किन्तु सत्य है पत्रकारों की माइक। माइक देखते ही भाजपा नेता बौरा जाते हैं और अपनी हद भूल जाते हैं। माइक के सामने सब बोलते हैं। कोई भी यह नेता नहीं कहता कि यह बात हमारे हद से बाहर है। यह विचित्र किन्तु सत्य या तो अनुशासनहीनता है या फिर पार्टी की रणनीति। दोनों ही स्थितियों में पार्टी के लिए यह हास्यास्पद है, क्योंकि भाजपा पार्टी विद डिफरेंस और अत्यधिक अनुशासन का ढिंढोरा पीटती रही है। अनुशासनहीनता है तो फिर पार्टी को कार्रवाई करनी चाहिए और अगर यह रणनीति का हिस्सा है तो यह रणनीति बदलनी चाहिए। भाजपा के दूसरे और विचित्र किन्तु सत्य हैं शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा। लगता है कि पार्टी के पास उनको चुप कराने का कोई उपाय नहीं बचा है। वे लगातार पार्टी नेतृत्व को एक तरह से चुनौती दे रहे हैं कि अगर दम है तो कार्रवाई करके दिखा। शायद ही क...