रफ्तार के बाजार में हमने कितनी लेट एंट्री मारी है? ऐसे लग रहा है जैसे आधा से अधिक सिलेबस खत्म होने के बाद किसी छात्र ने क्लास में एडमिशन लिया है। हम खुद को 21वीं सदी का देश मान रहे हैं, पूरे विश्व का नेतृत्व करने का दंभ भर रहे हैं। अमेरिका, चीन और जापान को पीछे छोड़ने की बात कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन के सामने खड़े होने को बेकरार हैं लेकिन.....। यह लेकिन बहुत बड़ा लेकिन है। क्या हम अमेरिका और बाकी देशों के बराबर खड़े भी हो पाए हैं। क्या विश्व हमें अपना नेता केवल इसलिए मान ले कि हमारे यहां कभी कोहिनूर था और हमारे देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। या केवल इस बात के लिए विश्व हमें नमन करे कि यहां कभी नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय होते थे। क्या हम इसलिए सरदार हो गए हैं कि हमारे पास विश्व की दूसरी सबसे अधिक जनसंख्या है। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो गलत हैं। हम ऐसा तभी कर पाएंगे जब हम उनकी बराबरी करेंगे, विकास करेंगे। हमारा रहन-सहन भी विश्वस्तरीय होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हम नाहक मूंगेरीलाल के हसीन सपने देखते रहेंगे। ...