पिछले पोस्ट में आपने पढ़ा था कि दादरी का जवाब मालदा और पूर्णिया है तो पठानकोट का क्या? दादरी पर सरकार कठघरे में थी तो मालदा और पूर्णिया में विपक्ष। प्रधानमंत्री की पकिस्तान यात्रा के तुरं बाद रिटर्न गिफ्ट में मिली पठानकोट की घटना के बाद सरकार फिर कठघरे में थी। सरकार के लिए संक्रांति के समय अच्छी खबर पाकिस्तान से आई कि जैश के मुखिया को गिरफ्तार कर लिया गया है पर समय के साथ इस खबर की हवा निकल गई। सरकार अब तक कठघरे में थी ही कि एक और अशुभ समाचार ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में रोहित नाम के दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली। राजनीतिज्ञों के लिए इस तरह की घटनाएं तो राजनीति चमकाने का जरिया होती हैं। हैदराबाद इस समय नेताओं के लिए हॉट केक बना हुआ है। मेरी राजनीति अच्छी है और तुम्हारी खराब की तर्ज़ पर एक नेता जा रहा है तो दूसरा आ रहा है। पठानकोट की घटना के बाद से अब तक सरकार कठघरे में है। सरकार के लिए नए साल में कोई खुशखबरी नहीं आई है। इसलिए सरकार अभी तक रक्षात्मक मुद्रा में ही है। हालाँकि दिखाने के लिए वह आक्रामक तेवर अपनाए हुए है। जैसे ही पठानकोट, हैदरा...